Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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छूट गया पड़ाव

आदर्श एवं यथार्थ के झूले में झूलता मर्मस्पर्शी उपन्यासः ‘छूट गया पड़ाव’

          कथाकार डाॅ0 ‘निशंक’ की जीवनमूल्य विषयक चिंतन-धरा का जीवंत प्रतीक बन जाने वाला उपन्यास है- ‘छूट गया पड़ाव’, जिसमें डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने एक शिक्षिका ‘सरोज’ के माध्यम से  जीवन के चिरंतन आदर्शों और कठोर यथार्थ के बीच झूलते पर्वतीय जीवन को अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति दी है। ‘छूट गया पड़ाव’ की कथा-नायिका सरोज, ‘बिनगढ़’ गाँव के मुखिया आनंद सिंह, स्वयंसेवी संस्था के संचालक श्री राम प्रकाश और इस उपन्यास की केन्द्र ‘रानी’ के माध्यम से रची गई डाॅ0 ‘निशंक’ की इस मार्मिक कथा को पाठक गद्गद् होकर पढ़ता है और इसके माध्यम से अभिव्यक्त हुए जीवन-मूल्यों के प्रति पाठक की आस्था और विश्वास में अभिवृद्धि सहज रूप में होती है।

डाॅ0 ‘निशंक’ के अन्य सात उपन्यासों की ही तरह इस उपन्यास ‘छूट गया पड़ाव’ में भी उन्होंने कथा के ताने-बाने को जीवन-मूल्यों के आधर पर ही गढ़ा है। स्वयं डाॅ0 ‘निशंक’ ने इस उपन्यास की भूमिका ‘अपनी बात’ में लिखा है- ‘हम विज्ञान और तकनीकी क्षेत्रा की उन्नति की ओर उन्मुख हुए हैं, तो अपनी परम्पराओं, अपने मूल्यों और अपनी आस्थाओं से गहरे जुड़े भी हैं।

          क्षरित होते जा रहे जीवन मूल्यों से जूझ रहे हैं, तो सहकार, सरोकार, प्रेम, परोपकार और मानवीय मूल्यों पर डटे हुए भी हैं।’

          मुझे लगता है कि डाॅ0 ‘निशंक’ साहित्य साध्क के रूप में निरंतर जीवन के आदर्शों और पर्वतीय जीवन के यथार्थ को संजोते हुए कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में कथा और पात्रों के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों को अभिव्यक्ति देते चलते हैं और इसी क्रम में वे अपने प्रतिदिन के जीवनानुभवों को भी रूपायित कर देते हैं। उन्होंने कहा भी है- ‘साहित्य साध्ना मेरे लिए वैसी ही अपरिहार्य है जैसे शरीर के लिए श्वास-प्रश्वास। मेरी दैनंदिनी ऊर्जा का यह अजस्र स्रोत है। हर सृजन मुझमें नई ताजगी भरता है और आगे बढ़ निकलने का हौसला देता है। यह सिलसिला पिछले तीन दशकों से अनवरत चला आ रहा है। जो देखा, महसूस किया और भोगा, वह मनोभावों में उमड़ कर सीध्ी, सरल और बोलचाल की भाषा में ढलता चला गया।’

          डाॅ0 ‘निशंक’ के इस मार्मिक उपन्यास ‘छूट गया पड़ाव’ की भूमिका लिखते हुए विद्वान समीक्षक डाॅ0 हरिमोहन ने इसे एक उद्देश्यपरक उपन्यास माना है और पर्वतीय जीवन के शाश्वत जीवन-मूल्यों को केन्द्र में रखकर कथा का ताना-बाना बुना गया है। डाॅ0 हरिमोहन कहते हैं-  ‘एक तरह से यही दृष्टिकोण इस उपन्यास का मेरुदण्ड है। रचनाकार का दृष्टिकोण ;च्वपदज व िअपमूद्ध किसी भी आख्यान का प्रमुख तत्त्व माना जा सकता है। निश्चय ही शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन में युवाओं - विशेष रूप से शिक्षित नारी की भूमिका को लेकर ‘निशंक’ ने जो दृष्टिकोण सामने रखा है, वह इस लघु उपन्यास का प्रमुख तत्त्व है। यह उनकी जीवन-दृष्टि का परिचायक है। वे रेखांकित करते हैं, ‘‘संवेदनाएं खत्म हो गई हैं। इसलिए सहकार और सरोकार भी खत्म हो रहे हैं। दुनिया बस घर तक और अपने बच्चों तक सिमटकर रह गई है।’’ वे इस स्थिति को बदलना चाहते हैं और समाज के केन्द्र में संवेदना, सहकार और सरोकार को स्थापित करना चाहते हैं।’

          आज साहित्य-जगत में ‘नारी-विमर्श’ का बोलबाला है और समीक्षक गण विशेष रूप से उपन्यासों और कहानियों में नारी विमर्श को खोजने में प्रयत्नशील हैं। डाॅ0 हरिमोहन इस दृष्टि से भी डाॅ0 ‘निशंक’ के इस उपन्यास को प्रभावशाली रचना मानते हुए कहते हैं- ‘नारी विमर्श