Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

Buy NowNext

अपना पराया

मार्मिक संवेदनाओं एवं उदात जीवन-मूल्यों का जीवंत दर्पण : उपन्यास ‘अपना पराया’
         कथाकार डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ मूलतः कवि हैं, इसीलिए उन्होंने अपने कथा-साहित्य में भी सर्वत्र मार्मिक संवेदनाओं, अंतर्द्वंदों और सहज भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है। एक सजग और संवेदनशील कवि की झांकियां उनके सभी उपन्यासों, ‘बीरा’, ‘निशांत’, ‘मेजर निराला’ और ‘पहाड़ से ऊँचा’ के साथ-साथ कहानियों में भी हम पाते हैं।
          डाॅ0 ‘निशंक’ का चर्चित एवं प्रशंसित उपन्यास ‘अपना पराया’ सन् 2010 में प्रकाशित हुआ, जिसको समीक्षकों ने पर्वतीय-जीवन का सजीव दर्पण कहकर यह स्वीकार किया है कि डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के इस उपन्यास में अत्यंत कुशलतापूर्वक पर्वतीय लोगों के अभावमय जीवन, सामाजिक विसंगतियों, आर्थिक समस्याओं, पलायन तथा स्वाभिमानी जीवन दर्शन को चित्रित करते हुए, मार्मिक संवेदनाओं तथा उदात्त जीवन-मूल्यों के आधर पर कथानक का ताना-बाना बुना गया है।
          डाॅ. ‘निशंक’ के इस उपन्यास ‘अपना पराया’ की सबसे बड़ी विशेषता और उपलब्धि समीक्षकों ने यह मानी है कि इस उपन्यास का कथानक और पात्रा मानवीय-संबंधें और सहज संवेदनाओं को उकेरने में अत्यंत सफल हैं। मानव-मन की सहज आत्मीयता, अगाध् विश्वास, अटूट आस्था और अपार स्नेह जैसे उदात्त जीवन-मूल्यों को सर्वाेच्च सम्मान देने के साथ-साथ कथाकार डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने अपने उपन्यास ‘अपना पराया’ में ईर्ष्या, जलन, लालच, दुराव, शत्राुता और बदले की भावना जैसे नकारात्मक जीवन-मूल्यों की स्वाभाविक तथा सहज अभिव्यक्ति अपने कथा-संगठन और पात्रों के माध्यम से कराते हुए जिस मनोवैज्ञानिक अंतःसंघर्ष की सृष्टि की है, उसे समीक्षकों ने इस उपन्यास का प्राण तत्व स्वीकार किया है। 
          विद्वान समीक्षक डाॅ0 देव सिंह पोखरिया ने कथाकार डाॅ0 ‘निशंक’ के इस उपन्यास की भूमिका में लिखा है- 
          ‘‘इस उपन्यास में आंचलिक रंगों के झीने ताने-बाने विद्यमान हैं। स्थानीय शब्दावली - ‘पंदेरा’ (पनघट) ‘रैबार’ (संदेश) ‘पिठाईं’ (तिलक-भेंट) ‘थौळ’ (मेला) ‘सौरगृह’ (प्रसवकक्ष) ‘परोठी’ (घी रखने का लकड़ी का बर्तन) आदि शब्द, विभिन्न परिधन, मेले, विवाह की रस्में- गारी हल्दी-उबटन आदि परंपराओं में लोक-जीवन के रंग उभरे हैं। संस्कृत की तत्सम् एवं संश्लिष्ट शब्दावली के साथ ही, जन-प्रचलित अरबी, पफारसी, अरबी भाषा के शब्द भाषा-शिल्प को जीवंत बनाने वाले हैं। ग्रामीण मुहावरेदार और लोकोक्तिपरक वाक्य-रचना उपन्यास के आंचलिक वैशिष्ट्य को उकेरती हैं। इस उपन्यास में आधुनिक उपन्यासों की दार्शनिक या वैचारिक बोझिलता और कथ्य-विहीनता नहीं, एक सहज-सरल प्रवाह और घटना-बाहुल्य है। चलचित्रा की तरह पात्रा आवश्यकतानुसार स्वयमेव सम्मुख उपस्थित होते जाते हैं और कथा-सूत्रा को आगे बढ़ाते चलते हैं।’’ (पृष्ठ- 7-8)
          डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ निस्संदेह पर्वतीय-जीवन और पर्वतीय-संस्कृति को अत्यंत निकट से देखते-परखते-समझते रहे हैं और यही कारण है कि उनके सभी उपन्यासों और कहानियों में पहाड़ रचा-बसा दिखायी देता है। जहाँ उनके उपन्यासों- ‘बीरा’ तथा ‘निशांत’ में मूलतः पर्वतीय नारी के त्याग, समर्पण, सहनशक्ति, कर्मशीलता और श्रम जैसे जीवन-मूल्यों की मुखर अभिव्यक्ति हमें मिलती है, वहीं डाॅ0 ‘निशंक’ का यह नया उपन्यास ‘अपना पराया’ कथा-संगठन और जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति की दृष्टि से अनूठा सिद्ध होता है। 
           ‘अपना पराया’ उपन्यास में डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने मनोविज्ञान के आधर पर नारी-मन के सृजनात्मक एवं नकारात्मक जीवन-मूल्यों की सजीव झांकियां प्रस्तुत करके स्मरणीय कथाकृति हिन्दी जगत को दी है। ‘अपना पराया’ में कथानक को कथाकार डाॅ0 ‘निशंक’ ने दो मुख्य कथाओं में बाँटा है, एक कथा है लक्ष्मी और सुरेश की, तो दूसरी कथा है राहुल-रश्मि और अनीता की। लक्ष्मी इस उपन्यास की ऐसी जीवंत नारी पात्रा है, जो ‘अपना पराया’ उपन्यास की दोनों कथाओं को जोड़ती है और पर्वतीय नारी के जीवन का जीवंत दर्पण बन गयी है।
         डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ऐसे कथाकार हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में उदात्त जीवन-मूल्यों को चित्रित करते हुए समाज, संस्कृति, राजनीति, ध्र्म, दर्शन और साहित्य के अनेक प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास किया है।
          ‘अपना पराया’ उपन्यास कवि-कथाकार डाॅ. ‘निशंक’ की ऐसी कथाकृति है, जिसमें ‘नारी-मन’ की गुत्थियों को सुलझाने के साथ-साथ समाज में निरंतर व्याप्त त्याग, समर्पण, प्रेम, सहनशीलता, अपनत्व और उत्सर्ग जैसे जीवन-मूल्यों की आधरभूमि पर डाॅ. ‘निशंक’ ने आदर्श पात्रों का सृजन किया है, तो दूसरी ओर नकारात्मक चिंतन के कारण उत्पन्न जीवन-मूल्यों लालच, स्वार्थ, छीनाझपटी, ईष्र्या और हिंसा आदि का भी सजीव चित्राण करते हुए मानसिक द्वन्द्व एवं अंतःसंघर्ष की अभिव्यक्ति करायी है।
           ‘अपना पराया’ उपन्यास की लक्ष्मी ऐसी नारी है, जो त्याग, समर्पण, सहिष्णुता, प्रेम, परोपकार, बलिदान और क्षमा आदि उदात्त जीवन-मूल्यों की जीवंत प्रतीक बन गयी है, तो दूसरी ओर लक्ष्मी की सास ‘कमला’ के माध्यम से डाॅ. ‘निशंक’ ने नारी-मन के अध्ःपतन के प्रतीक स्वार्थ, ईर्ष्या, हठ, लालच, जलन, हिंसा और क्रोध् जैसे नकारात्मक मूल्यों की सजीव अभिव्यक्ति करायी है।