Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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प्रतिज्ञा

          असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय और बुराई पर अच्छाई की विजय: उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’
कवि एवं कथाकार डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा रचित नवीनतम् उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ हाल ही में सन् 2011 में प्रकाशित होकर आया है और समीक्षकों ने एक मत से स्वीकार किया है कि अपने इस उपन्यास में डाॅ. ‘निशंक’ ने पर्वतीय-जीवन के वर्तमान यथार्थ को परम्परित आदर्शों की नीव पर संजो कर एक ऐसी कथाकृति का सृजन किया है, जिसमें पर्वतीय-जीवन के संस्कारों और मर्यादाओं के साथ-साथ आध्ुनिक सभ्यता के आने से उत्पन्न विसंगतियों का भी चित्राण किया गया है। डाॅ. ‘निशंक’ के इससे पूर्व जो उपन्यास आए हैं, उनमें ‘बीरा’ और ‘निशांत’ के साथ ही ‘पल्लवी’ में पर्वतीय-नारी के चरित्रा को अत्यंत उदात्त और गौरवमय रूप में उकेरा गया है। ‘बीरा’ और ‘पल्लवी’ तो डाॅ. ‘निशंक’ के ऐसे उपन्यास हैं, जिनका नामकरण ही नायिकाओं के नाम पर किया गया है, जबकि ‘निशांत’ ऐसा उपन्यास है, जिसमें सारी कथा यद्यपि नायिका के इर्द-गिर्द ही घूमती है, पिफर भी डाॅ. ‘निशंक’ ने ‘निशांत’ की नायिका को गौरव देते हुए, उनके त्याग को दृष्टिगत रखकर, इसका नामकरण नायक के नाम पर किया है।
          डाॅ. ‘निशंक’ का सद्यः प्रकाशित उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ अब तक प्रकाशित उनके छहों उपन्यासों से कथानक और घटनाओं की दृष्टि के साथ-साथ वैचारिक और भावनात्मक ध्रातल पर भी कुछ अलग रंग लिए हुए है। ‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास में कथाकार डाॅ. ‘निशंक’ ने पर्वतीय समाज की ज्वलंत समस्याओं, जैसे युवा वर्ग का पलायन, शराब के अभिशाप से त्रास्त पर्वतीय समाज, रोजगार के अभाव में गरीबी से जूझते पर्वतीय लोग तथा जीवन की सुविधओं की कमी आदि को केन्द्र में  रखकर कथा का ताना-बाना बुना है।
          डाॅ. ‘निशंक’ के इस उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ में प्रमुख पात्रा हैं- वीर सिंह ;वीरूद्ध, कुलदीप ;कुल्लूद्ध, भैरव चाचा, आनन्द पफौजी, गुन्दरू जैसे पुरुष पात्रा और सुनीता, भागुली, सुन्दरा, रजनी, नीरू भाभी, सुमित्रा जैसे नारी पात्रा हैं। इन सभी पात्रों के माध्यम से डाॅ. ‘निशंक’ ने अत्यंत कुशलतापूर्वक एक ऐसी रोचक और यथार्थमूलक कथा का ताना-बाना बुना है, जिसमें सकारात्मक जीवन-मूल्यों के साथ-साथ नकारात्मक जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति कराते हुए डाॅ. ‘निशंक’ ने पर्वतीय-जीवन को साकार किया है। स्वयं कथाकार डाॅ. ‘निशंक’ ने अपने इस उपन्यास की भूमिका में लिखा है- ‘‘मेरी सारी कहानियाँ, कविताएँ और उपन्यास इन्हीं सामाजिक-मूल्यों लोकजीवन की संवेदनाओं से उपजे हैं। या यूँ कहूँ- ये जीवंत दस्तावेज हैं मेरी अब तक की जीवन-यात्रा के। हालाँकि अपनी रचनाओं में मैंने देवभूमि उत्तराखण्ड की समृ( संस्कृति व गौरवशाली गाथाओं समेत यहाँ के पौराणिक, धर्मिक, सामाजिक परिवेश व परंपराओं से भी पाठकों को अवगत कराने की कोशिश की है। दिल की गहराइयों में हिलोरें लेती देशप्रेम की भावनाओं को भी अभिव्यक्ति दी है, लेकिन साहित्य-सृजन एक तरह से मेरा जुनून है।’’ (पृष्ठ 5)
          मुझे लगता है कि कथाकार डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ एक ईमानदार रचनाकार के रूप में अपने हृदय और मस्तिष्क का समन्वय अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करके अपनी कथावस्तु को पात्रों के माध्यम से ऐसी शक्ति प्रदान कर देते हैं, जो उनकी रचनाओं को रोचक के साथ-साथ उद्देश्यपूर्ण भी बना देती है। समीक्ष्य उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ में डाॅ. ‘निशंक’ ने अत्यंत कुशलता के साथ सकारात्मक एवं नकारात्मक जीवन-मूल्यों का सशक्त द्वन्द्व तो अपने सजीव पात्रों, घटनाओं और परिवेश के माध्यम से प्रस्तुत किया ही है, साथ ही वर्तमान राजनीति के घिनौने यथार्थ और पहाड़ के युवाओं को खोखला करने वाली शराब की लत को भी अत्यंत कुशलता के साथ कथानक का अंग बना दिया है। इसी के साथ डाॅ. ‘निशंक’ ने इस उपन्यास में देवभूमि से युवाओं के निरंतर पलायन की समस्या को भी उठाया है और सरकारी नौकरियों के लालच से युवाओं को निकालकर स्वरोजगार और परिश्रम की ओर प्रेरित किया है। मेरी दृष्टि में, डाॅ. ‘निशंक’ का ‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास कथा सम्राट प्रेमचन्द की उस कथा शैली का स्मरण कराता है, जहाँ कथा सम्राट प्रेमचन्द अपने कथानकों तथा पात्रों के माध्यम से समाज की ज्वलंत समस्याओं को सपफलतापूर्वक उठाते आए हैं। इस संदर्भ में मैं पुनः डाॅ. ‘निशंक’ द्वारा लिखे गए ‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास के ‘निवेदन’ से उनके ये शब्द उ(ृत करना चाहूँगा- ‘‘मेरे भीतर की छटपटाहट ही मेरा साहित्य है। मेरा देखा, महसूस किया और भोगा यथार्थ, वेदना-संवेदना, अनुभूति और अनुभवों से अनुप्राणित। कभी जीवन-मूल्यों की धड़कन बनकर, तो कभी आम आदमी की आवाज बनकर मैं इन्हें सीधे सरल शब्दों में अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश करता रहा हूँ।’’ (पृष्ठ 5)