Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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हिमालय में स्वामी विवेकानंद

    हिमालय सुख, समृ(ि और शान्ति का प्रतीक है। यहाँ आस्था, आध्यात्म तथा रोमांच का प्रवाह है। हिमालय के आन्तरिक और वाह्य परिवेश में निहित ‘शक्तिपुँज’ से विश्व जनमानस सदैव ही लाभान्वित होता रहा। यही कारण है कि अनादिकाल से ही हिमालयी क्षेत्रा देवी-देवताओं, ट्टषि-मुनियों, चिंतकों, वैज्ञानिकांे सहित सम्पूर्ण विश्व के मानव के लिए प्रेरणा व ऊर्जा का स्रोत बना। 
    हिमालय का यही आलौकिक एवं वैभव उत्तराखण्ड हिमालय को देवभूमि एवं तपोभूमि के रूप में सुख, समृ(ि और शान्ति सहित प्रगति का प्रतीक माना जाता है। यहाँ से संस्कृति एवं समृ(ि की वाहक जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी व ज्ञानवाहिनी गंगा का अवतरण हुआ। 
    उत्तराखण्ड हिमालय का प्राकृतिक वैभव सम्पूर्ण विश्व को अपने विशु( पर्यावरण से पोषित करता है। हिमालय में विद्यमान दुलर्भ जड़ी-बूटियां मानव के तन को स्वस्थ रखने के लिए ‘संजीवनी बूटी’ के सदृश हैं, तो दूसरी ओर गंगाजल की एक-एक बूँद भारतीय समाज एवं संस्कृति में ही नहीं अपितु पूरी दुनियाँ के मानस के लिए  ‘अमृत जल’ के सम्मान है। 
    उत्तराखण्ड हिमालय का प्राकृतिक सौन्दर्य मानव के तन-मन को नई ऊर्जा एवं स्पफूर्ति प्रदान करने वाला है। यह क्षेत्रा आयुर्वेद और योग का जन्मदाता है तथा वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों की ध्रती है। उत्तराखण्ड हिमालय में विद्यमान ‘शक्तिपुँज’ का वर्णन अनेकों ग्रन्थों में मिलता है।
    आध्ुनिक भारत के प्रतीक स्वामी विवेकानन्द ने भी अनादिकाल से देवी-देवताओं, ट्टषि-मुनियों वैज्ञानिकों, चिंतकों की इस देेवभूमि एवं तपोभूमि के शक्तिपुँज से स्वयं को ऊर्जा व प्रखरता से आलौकिक किया। उन्होंने भारतीय दर्शन, मानव जीवन, संस्कृति और सभ्यता, विज्ञान तथा इतिहास का समग्र ज्ञान उत्तराखण्ड हिमालय से ही अर्जित किया। नरेन्द्र नामक इस युवा सन्यासी ने अपनी अनेक जिज्ञासाओं के निराकरण के लिए उत्तराखण्ड हिमालय में भ्रमण किया तो उन्हें यहीं अल्मोड़ा के समीप काकड़ीघाट नामक स्थल में प्रकृति की वैभवता के मध्य अणु व परमाणु ज्ञान की अनुभूति हुई। इस हिमालयी शक्तिपुँज से ऊर्जा और प्रखरता प्राप्त कर नरेन्द्र वर्ष 1893 में शिकागों में विश्व  ध्र्म सम्मेलन में भारतीय सभ्यता संस्कृति वेद और दर्शन पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया तो सम्पूर्ण विश्व भारत को जान जाता है। उत्तराखण्ड हिमालय का आलोक स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व से विश्व जनमानस को चमत्कृत कर जाता है। 
    यही कारण रहा कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवनकाल में देशाटन करते हुए सबसे अध्कि पाँच बार उत्तराखण्ड हिमालय का भ्रमण किया। जब-जब स्वामी जी को हिमालय की विराटता से शक्ति, शान्ति तथा दृढ़ता की आवश्यकता हुई उन्होंने उत्तराखण्ड में प्रवास किया। इसी भूमि में स्वामी जी ने अपने प्रवास के दौरान योग-ध्यान करते हुये ऊर्जा दृढ़ता व शक्ति अर्जित की। निश्चित ही उत्तराखण्ड हिमालय की ध्रती ने युवा नरेन्द्र को स्वामी विवेकानन्द बना दिया।  
    ‘हिमालय में विवेकानन्द’  पुस्तक के माध्यम से स्वामी जी के उत्तराखण्ड हिमालय के विभिन्न स्थलों की यात्राओं व प्रवास का विवरण संकलित किये जाने का प्रयास किया गया है। उत्तराखण्ड हिमालय में स्वामी विवेकानन्द के पदचिन्हों पर विभिन्न जिज्ञासाओं के निराकरण के लिए जब मैंने  कई  बार उन स्थलों का भ्रमण किया तो प्रत्येक बार मुझे नई स्पफूर्ति का अहसास हुआ। इस पुस्तक के लेखन में अल्मोड़ा में स्वामी विवेकानन्द की स्मृतियों को सहेजकर रखे लाला बद्रीशाह के पौत्रा गिरीश शाह व उनकी ध्र्मपत्नी के सहयोग एवं सुझावों के लिए मैं विशेषरूप से कृतज्ञ हूँ, साथ ही सामग्री चयन एवं पफोटो संकलन के लिए प्रिय भाई सर्वेश उनियाल एवं मोहन नैथानी का भी आभार व्यक्त करता हूँ। 
    वर्तमान परिदृश्य में सुख, समृ(ि तथा प्रगति के क्रम से शान्ति के लिए उत्तराखण्ड हिमालय के ‘शक्तिपुँज’ से परिचित होने के साथ-साथ देवात्मा हिमालय के दर्शन का विनम्र आमंत्राण इस पुस्तक के रूप में आप सभी को समर्पित है।

-रमेश पोखरियाल ‘निशंक’