Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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खुशियों का देश भूटान

    एक लंबे अर्से से मन में भूटान जाने की इच्छा थी। वर्ष 2010 में पर्वतीय क्षेत्रा के मुख्यमंत्रियों के शिमला कान्क्लेव में मैंने महसूस किया था कि यदि हिमालय क्षेत्रा का विकास करना है तो इसके लिए एक विशेष-रणनीति के सृजन की आवश्यकता है। एक ऐसी ठोस रणनीति जिसका ध्रातल पर सपफल क्रियान्वयन हो सके। 
    मैंने इस बैठक में विकास के लिए सभी हितधरकों के साथ मिलकर एक समग्र रोड़मैप तैयार करने पर जोर दिया, जिसके माध्यम से हिमालयी क्षेत्रा को एक ईकाई के रूप में देखकर इसके विकास हेतु प्रयत्न किए जा सकें। समयब(ता और कुशल क्रियान्वयन संबंध्ी निगरानी तंत्रा की स्थापना और हिमालय से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर हिमालयी राज्येां के बीच एकता स्थापित करने का प्रयास किया। शिमला प्रवास के दौरान मन में यह विचार आया कि मुझे सभी हिमालयी देशों की यात्रा करनी चाहिए, साथ ही मुझे लगा कि कहीं न कहीं हम सभी अपनी सांझे सांस्कृतिक मूल्यों से, अपनी समृ( विरासत से जुड़े हैं, ऐसे में साहित्य एक सेतु के रूप में सभी राष्ट्रों को एक कर सकता है। मुझे ऐसा भी लगा कि हमारे लोगों के मध्य अध्कि से अध्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान होना चाहिए। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक संबंधें को प्रगाढ़ करते हुए क्षेत्राीय विकास की अवधरणा को ध्रातल पर उतारना चाहिए। यह महज संयोग था कि भूटान के विदेश मंत्राी भी यही कुछ महसूस करते हैं। थिंपू हवाई अड्डे पर उन्होंने मुझसे यही कहा। 
    20 पफरवरी की सुबह को जब भूटान के विदेश मंत्राी से मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझसे कहा कि भूटान के संबंध् में भारत के कम ही लोगों को जानकारी है। उन्होंने कहा कि हम इतने निकट होते हुए भी च्मवचसम जव चमवचसम बवदजंबज ;वैयक्तिक सम्पर्कद्ध के मामले में कापफी दूर हैं। उन्होंने आगे बताया कि भूटान देश में अध्कितर लोग हिन्दी समझते हैं, विशेषकर 1960 के दशक में स्कूली शिक्षा ग्रहण करने वाले अध्किांश लोग अच्छी हिन्दी बोल लेते हैं। विदेश मंत्राी ने इस बात पर जोर दिया कि भूटान के बारे में भारतीय लोगों को अध्कि जागरूक करने की जरूरत है और ऐसे में दोनों देशों के मध्य  अध्कि सांस्कृतिक, साहित्यिक आदान-प्रदान की आवश्यकता है। इसी क्रम में मैं यह बताना चाहूँगा कि भूटान नरेश से वार्ता के दौरान यह विषय सामने आया कि भूटान और भारत के सदियों पुराने संबंध् हैं। 8वीं सदी में गुरु रिन्पोचे ने जिन्हें हम ‘पदम संभव’ के नाम से जानते हैं, भूटान में बौ( ध्र्म की पताका को पफहराया था।
    भूटान के लोग गुरू रिन्पोचे को भगवान बु( का ही रूप मानते हैं। बातों-बातों में भूटान नरेश ने बताया कि हमारी साझी धर्मिक विरासत है। भूटान नरेश ने बताया कि भूटान का ध्र्म, अध्यात्म और आस्था हिन्दू ध्र्म से जुड़ी हुई है। उनका भी यह मानना था कि हिमालय क्षेत्रा के सुनियोजित एवं सतत विकास हेतु दोनों देश मिलकर कापफी काम कर सकते हैं। 
    उन्होंने कहा कि आपने भूटान आने में कापफी देर कर दी है। उनका मत था कि अगर हम दोनों देशों को निकट लाना चाहते हैं तो हमें हर स्तर पर अपनी पारम्परिक गतिविध्यिाँ बढ़ानी ही चाहिए। दोनों देशों के बीच आध्किारिक और मंत्राी स्तर पर ज्यादा यात्रा होनी चाहिए। 
    भूटान नरेश से बातों में मैंने स्वयं स्वीकार किया कि मुझे भूटान कापफी पहले आना चाहिए था, क्योंकि 1010 में मेरे मुख्यमंत्रित्वकाल में भूटान नरेश मेरे आवास पर आकर स्वयं मुझे भूटान आने का निमंत्राण दिया था।  
    भूटान से और उसके लोगांे से व्यक्तिगत रूप में मेरा कापफी प्रगाढ़ संबंध् रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भूटानी लोगों को मैं आचार, व्यवहार से उत्तराखण्ड या हिमालयी राज्यों के जनमानस के अत्यध्कि करीब पाता हूँ। हो भी क्यों न, केवल नेपाल और भूटान ऐसे देश हैं जहाँ लोगों के व्यवहार में अपनापन, एक दूसरे के लिए समर्पण की भावना और रीति-रिवाजों में अत्यध्कि समानता देखने को मिलती है। सदियों पुराना हमारा संबंध् किसी सरकार, राजतंत्रा या किसी राजनैतिक एवं सामाजिक दल पर निर्भर न होकर विशु( आत्मिक, भावनात्मक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों का संबंध् है जो आदिकाल से चला आ रहा है और युग युगान्तर तक चलता रहेगा। 
    एक रचनाकार के रूप में भूटान के नैसर्गिक सौन्दर्य ने हमेशा मुझे आकर्षित किया है। भूटान को अध्कि जानने का मन हुआ तो पुस्तकें ढूंढी। मैंने देखा है कि भूटान के विषय में साहित्य का अभाव है। इसका कारण यह रहा होगा कि यह देश कुछ दशक पूर्व तक अपने तक ही सीमित था और विदेशियों का वहाँ आना-जाना कापफी सीमित था। भूटान के विषय में उपलब्ध् साहित्य में अध्कित्तर पुस्तकें अंग्रेजी में हैं। भूटान को अध्कि निकट लाने हेतु हिन्दी साहित्य, बालीवुड, हमारी पत्रिकाएँ एवं अखबार सेतु की भूमिका निभा सकते हंै। इसी से प्रेरित होकर मैंने एक पुस्तक लिखने का मन बनाया जो आज यह पुस्तक आपके समक्ष है। 
    इस पुस्तक में मैंने भूटान के विषय में जानकारी देने का प्रयास किया है। इसके अतिरिक्त भूटान की विशेषताआंे को पुस्तक में स्थान दिया है, वहीं कुछ अध्यायों में अपने निजी विचारों को आपसे साझा किया है। 
    भूटान रहस्यों से भरा देश रहा है। पूरे विश्व के लोग भूटान के बारे में जानने के इच्छुक रहे हैं। चाहे भूटान का बौ( ध्र्म हो, चाहे पिफर यहाँ का जनजीवन हो, संस्कृति हो, यहाँ की स्थापत्य कला हो, सभी के बारे में लोग के मन में एक जिज्ञासा है। लोग भूटान के बारे में जानना चाहते हैं और उन्हें जानकारी उपलब्ध् कराने की मेरी यह छोटी सी कोशिश है। 
    भूटान की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विशेषताओं के अतिरिक्त, प्रस्तुत पुस्तक में मैंने भूटान के पर्यटन स्थलों के विषय में भी लिखा है, वहीं वहाँ पर ढांचागत अवस्थापना विकास के क्षेत्रा में उपलब्ध्यिों को सुध् िपाठकों के समक्ष रखने का प्रयत्न किया है। भारत-भूटान संबंधें की प्रगाढ़ता, भगवान बु( गुरू रिपोंचे का अटूट संबंध्, भूटान के विकास में भारतीय योगदान जैसे विभिन्न विषयों को पाठकों के सम्मुख रखने का विनीत प्रयास किया है। 
    मैंने यह महसूस किया कि सच में भारत के लोगों में भूटान के संबंध् में जानकारी बहुत कम है। इसका मुख्य कारण यह है कि भूटान के संबंध् में भारत में साहित्य बहुत ही कम उपलब्ध् है। विशेषकर हिन्दी भाषा में साहित्य न के बराबर है। कमोबेश यही बात भूटान के संबंध् में भी कही जा सकती है। भारत के विषय में भूटान में कम साहित्य उपलब्ध् है। 
    ऐसी स्थिति में मुझे लगा कि भूटान के विषय में एक ऐसी पुस्तक उपलब्ध् होनी चाहिए जिसमें भूटान के बारे में समग्र जानकारी एक ही जगह पर उपलब्ध् हो। मुझे भी लगा कि जब हमारे दोनों देशों के इतने घनिष्ठ संबंध् क्यों न हो यह तभी हो सकता है, जबकि हम एक-दूसरे को जाने। यही कुछ सोचकर इस पुस्तक को लिखने बैठा जो आपके हाथों में है। पुस्तक के माध्यम से भूटान की भौगोलिक स्थिति, आर्थिकी, सामाजिक जीवन, जनजीवन के साथ संस्कृति, खानपान को उजागर करने का प्रयास किया है। भूटान ने विश्व को ‘ग्राॅस नेशनल हैप्पीनेस’ का एक मूलमंत्रा दिया है। इस क्रान्तिकारी विचार की विस्तृत करने की मैंने कोशिश की है। 
    भारत-भूटान के मजबूत संबंधें का विश्लेषण करने के साथ दोनों देशों के मध्य जल विद्युत परियोजनाओं में सहयोग पर भी चर्चा की गयी है। मुझे आशा है कि इस प्रयास के माध्यम से भूटान को समझने में कुछ सहायता मिलेगी। 
    इस पुस्तक को लिखते समय मैंने विशेषकर अपनी नौजवान पीढ़ी को ध्यान में रखा है। मेरा मानना है कि दोनों देशों की युवा पीढ़ियों द्वारा एक-दूसरे के बारे में अध्कि से अध्कि जानने का प्रयास किया जाना चाहिए। मैं चाहे भूटान नरेश से मिला, चाहे प्रधनमंत्राी भूटान से या पिफर विदेश मंत्राी से, सभी ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों की युवा पीढ़ी पाश्चात्य रंग में रंगकर हमारे परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों से विमुख हो रही है। प्रगति की अंध्ी दौड़ में भौतिकवाद को अध्कि महत्व देते हुए हम अपनी परम्पराओं, मूल्यों, सभ्यता, रीति-रिवाजों तथा पुरातन ज्ञान की घोर उपेक्षा कर रहे हैं। मेरा मानना है कि इस उपेक्षा की हमें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह इसलिए भी आवश्यकता है कि हमारे दोनों देशों में युवाओं की बड़ी संख्या है। अन्य देशों की तुलना में हम अध्कि युवा हैं। 
    मुझे लगता है कि हमारा साहित्य हमें अपनी जड़ों से जोड़ने में सक्षम होनी चाहिए। कुछ इसी तरह का प्रयास इस पुस्तक में हुआ है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमंे अपने और एक दूसरे के गौरवमयी अतीत तथा उच्च सांस्कृतिक मूल्यों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। यह सच्चाई है और मैं इसको स्वीकार करता हूँ कि कहीं न कहीं कमी हो रही है। भारत-भूटान को निकट लाने में यह पुस्तक जरा भी मदद कर पाए तो मैं अपना प्रयास सार्थक समझूंगा। 
    प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से हर उस व्यक्ति को भूटान के संबंध् में आवश्यक एवं उपयोगी जानकारी मिल सकेगी, जो भूटान तथा हिमालय से प्यार करता है और उसके बारे में जानने की इच्छा रखता है। भगवान बु(, गुरू रिपोन्चे की कृपा से दोनों देश परस्पर सहयोग के रास्ते पर विकास और समृ(ि की ओर अग्रसर हांे इसी शुभेच्छा के साथ यह पुस्तक आपको सौंप रहा हूँ।
    पाठकों ने मुझे सदैव स्नेह दिया है। कहानियां, उपन्यास कविताएं हों या मेरे यात्रा संस्करण हों, सभी के माध्यम से सुध्ी पाठकों तक पहुंचने का मेरा प्रयास रहा है। मुझे विश्वास है कि भूटान के बारे में यह पुस्तक आपको अवश्य पसंद आयेगी और आप सभी अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवगत कराओगे।
    हाल में ही मुझे विश्व हिन्दी सम्मेलन में माॅरीशस जाने का अवसर प्राप्त हुआ। उद्घाटन भाषण में माॅरीशस के राष्ट्रपति जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही कि साहित्य और भाषा राष्ट्रों को नजदीक लाने हेतु एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती है। मैं भी पूरी शिद्दत से महसूस करता हूँ कि साहित्य दो देशों को जोड़ने की महत्वपूर्ण कड़ी है। 
    मुझे लगता है कि भारत और भूटान के पारस्परिक सम्बन्धें की प्रगाढ़ता के लिए साहित्यिक आदान-प्रदान अत्यन्त आवश्यक है। विचारों में बड़ी ताकत होती है और इस ताकत का उपयोग हमें साहित्य के माध्यम से करना चाहिए। भारत और भूटान के लोग इस किताब को हिन्दी में पढ़कर एक दूसरे के विषय जान पाऐंगे और इसका आनन्द उठायेंगे इस विश्वास के साथ यह पुस्तक आपके हाथों में सौंप रहा हूँ।

-डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’