Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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भारतीय संस्कृति का संवाहक इंडोनेशिया

    बात वर्ष 2010 की है। मेरे मुख्यमंत्रित्वकाल में हरिद्वार में ‘महाकुम्भ’ आयोजन किया जा रहा था। कई देशों के लोग पतित-पावनी गंगा में स्नान हेतु योग, आस्था और आध्यात्म की राजधनी हरिद्वार में जमा हो रहे थे। मुझे मेरे सलाहकार डाॅ0 राजेश नैथानी द्वारा बताया गया कि इण्डोनेशिया के राजदूत मिलने का समय मांग रहे हैं। मुलाकात का कोई एजेंडा नहीं था। पूछने पर पता चला कि वे ‘महाकुम्भ’ के सपफल आयोजन हेतु इण्डोनेशिया राष्ट्र की ओर से मुझे शुभकामनाएँ देना चाहते हैं। विश्व की सर्वाध्कि मुस्लिम जनसंख्या वाले देश की ‘कुम्भ’ के प्रति इतनी आस्था होगी, यह मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था। मैं उनसे मिला और मिलकर उनके भीतर एक गहरी आत्मीयता के भाव के दर्शन किए। उनकी विश्व के इस सबसे बड़े आयोजन के प्रति गहरी आस्था देखकर मैं हतप्रभ ही नहीं बल्कि अत्यन्त प्रभावित था। 
    मैंने उन्हें उत्तराखण्ड राज्य की ओर से गंगा जल भेंट किया और उन्होंने अत्यन्त सम्मान से अपने देश के लिए उसे ग्रहण किया। सच कहूँ इण्डोनेशिया की विशिष्ट संस्कृति और उसके भारत के निकट संबंधें का साक्षात्कार मुझे उस भेंट के दौरान ही हो गया था। उसके पश्चात् इस देश को और नजदीक से जानने की उत्सुकता जागृत हुई। हजारों साल बाद भी भारतीय संस्कृति का जीवंत रूप देखना है तो इण्डोनेशिया जाना चाहिए। मैंने अपनी कुछ पुस्तकें और गंगाजल भेंटकर जब इण्डोनेशिया के राजदूत से विदा ली तो लगा किसी आत्मीय से विदा ले रहा हूँ।
    नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर और विशिष्ट संस्कृति वाले इण्डोनेशिया ने मुझे हमेशा से अपनी ओर आकर्षित किया है। मैं इस देश के विषय में अध्कि से अध्कि जानने का इच्छुक रहा हूँ। इण्डोनेशिया को देखने, समझने की इच्छा मन में एक लंबे समय से थी। इसका मुख्य कारण यह था कि इण्डोनेशया में भारतीय संस्कृति के गहरे प्रभाव को मैं स्वयं देखना चाहता था।
    मन में यह जिज्ञासा भी थी कि किस प्रकार एक मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्र हिन्दू ध्र्म और संस्कृति से अपने को जोड़े रखने में सपफलता पायी है? न केवल इण्डोनेशिया ने अपने को इस अमर सनातन संस्कृति से जोड़ा है बल्कि, इसे समृ( बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशेषकर एक ऐसे समय में जब विश्व में कट्टरवाद, आतंकवाद, असमानता, अविश्वास, भय एवं असुरक्षा का वातावरण बना हुआ है। ऐसे समय में जब हम मात्रा स्वार्थसि(ि में लगकर मानवता के मूल्यों को भूल रहे हैं। ध्र्म, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रा और जाति की परिध् िमें अपने को समेटकर हम लालच में पड़कर नैतिकता को छोड़ पतन की तरपफ जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सारी मानव जाति भौतिकवाद की अंध्ी दौड़ में मानवीय मूल्यों को भूल बैठी है। ऐसे में इंडोनेशिया ने न केवल भारतीय संस्कृति को सहेजकर रखा है बल्कि उसे संरक्षित, संवधर््ित करने में सपफलता पायी है। 
    मेरा यह परम सौभाग्य है कि कुछ माह पूर्व जापान और थाईलैंड में विश्वविद्यालयों के आमंत्राण पर मैं वहाँ गया था। दोनों देशों ने मुझे भारतीय संस्कृति पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था। मैं जापान और थाईलैंड की यात्रा के साथ इंडोनेशिया की यात्रा करना चाहता था, शायद इसलिए क्योंकि इन तीनों राष्ट्रों में भारतीय संस्कृति का खासा प्रभाव देखने को मिलता है, या यों कहना चाहिए कि इन देशों में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत रूप देखने को मिलता है। हमारी संस्कृति, हमारे आदर्श, हमारे मानवीय मूल्य, हमारी सभ्यता, आज की वैश्विक चुनौतियों से मजबूती से निपटने का रास्ता प्रशस्त करती है। 
    भारतीय संस्कृति से करीब से जुड़े ये तीनों देश एशिया प्रशांत में विकास और शांति के महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। शायद यही कारण था कि मेरी इंडोनेशिया जाने की इच्छा एक लंबे समय से थी। मुझ जैसे लोगों की कठिनाई यह है कि सार्वजनिक जीवन में रहने के कारण अपना कार्यक्रम मुश्किल से अपने हाथ में होता है। पार्टी के शीर्ष पदाध्किारियों की देहरादून में बैठक प्रस्तावित रहने के कारण मुझे थाईलैंड का प्रवास दो दिन में ही समेटकर वापस आना पड़ा। इस कारण सिंगापुर, इंडोनेशिया का दौरा टल गया। 
    यह शायद संयोग ही था कि इसी बीच भारतीय सांस्कृतिक संबंध् परिषद के अध्यक्ष प्रो0 लोकेश चन्द्रा जी से उनके दिल्ली स्थित आवास पर मुलाकात हुई। प्रो0 लोकेश चन्द्रा जी की विद्वता, प्रखरता और गहन अध्ययन, अध्यात्म, इतिहास, सांस्कृतिक विषयों पर उनकी असाधरण पकड़ का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ। मेरा लंबे समय से उन्हें मिलने का मन था। मैंने महसूस किया है कि उनसे मिलकर, बात करके एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
    चर्चा के दौरान उन्होंने सुझाव दिया कि क्यों न मैं योग्यकार्ता में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में प्रतिभाग करूँ। तय हुआ कि भारतीय प्रतिनिध्मिंडल का नेतृत्व करते हुए मैं योगयकार्ता में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की इंडोनेशिया यात्रा की 90वीं वर्षगांठ पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिभाग करूंगा। 
    इस प्रस्तावित सेमिनार में मुझे उद्घाटन सत्रा का भाषण देना था जिसका विषय था ‘वैश्विक चुनौतियों से मिलकर निपटेंगे भारत-इंडोनेशिया।’ उक्त विषय पर मुझे व्याख्यान देने और तदुपरांत प्रश्नोत्तर सत्रा के लिए आग्रह किया गया। इस कार्यक्रम में मेरे साथ शांतिनिकेतन, ;विश्वभारती विश्वविद्यालयद्ध और जर्मनी के शिक्षाविद् शामिल थे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ जी ने वर्ष 1927 में जावा, इंडोनेशिया की यात्रा की थी। इस ऐतिहासिक यात्रा में अपने परम मित्रा श्री देवनतारा के साथ गुरुदेव ने अत्यन्त महत्वपूर्ण सामाजिक व राजनैतिक मुद्दों पर चर्चा की। मुझे बताया गया था कि प्रथम राष्ट्रपति श्री सुकर्णों, श्री देवनतारा और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की अच्छी घनिष्ठता थी। गुरुदेव और श्री देवनतारा के बीच दो समानताएँ देखने को मिलती हैं। दोनों ही प्रतिष्ठित परिवारों से थे और दोनों यूरोपीय रंग-ढंग से न केवल भलीभांति परिचित थे, बल्कि उसकी अच्छी समझ रखते थे। दोनों प्रखरता, विद्वता, विनम्रता और प्रतिष्ठा से परिपूर्ण थे और आराम से वैभव तथा विलासितापूर्ण जीवन जी सकते थे। परन्तु पिफर भी दोनों ने अपनी पूरी ताकत पिछड़े, उपेक्षित, गरीब लोगों के कल्याण के लिए झोंक दी। इसके लिए उन्होंने शैक्षणिक उन्नयन का मार्ग चुना। कहीं न कहीं दोनों के मन में अंतिम छोर के व्यक्ति को विकास की मुख्य धरा से जोड़ने की ललक व छटपटाहट छिपी थी। मुझे इस यात्रा से इन दोनों महापुरूषों के जीवन की अनेक घटनाओं के विषय में पता चला, जो हम सबके लिए प्रेरणादायक हैं। किस प्रकार बु(ीजीवी अपने आसपास के परिवेश में सार्थक परिवर्तन ला सकते हैं, यह हमें गुरूदेव और श्री देवनतारा के जीवन से सीखने को मिलता है। 
    भारत और इण्डोनेशिया कई मामलों में विलक्षण हैं। एक ओर भारत दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्रा है। 125 करोड़ से अध्कि  जनसंख्या वाला भारतीय गणतंत्रा अनेकता में एकता को चरितार्थ करता, विभिन्न ध्र्म, मजहब, भाषाएँ, विविध् परम्पराएँ लिए विश्व की प्राचीनतम सभ्यता का प्रतिनिध्त्वि करता है, तो दूसरी तरपफ विश्व में सर्वाध्कि मुस्लिम आबादी वाला इण्डोनेशिया भी विविध् ध्र्म, भाषाओं, परम्पराओं और रीति-रिवाजों का देश है। जहाँ हम दोनों देश विश्व की लगभग 25 प्रतिशत मानवता का प्रतिनिध्त्वि करते हैं, वहीं हमारी संस्कृति साझी हैं। यह कहना उचित रहेगा कि हमारी जीवनशैली समान आधरशिला पर आधरित है। सर्वोच्च मानवीय मूल्यों की पैरवी करती हमारी साझी विरासत पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। भारत और इण्डोनेशिया का प्रत्येक नागरिक इससे गौरवान्वित होता होगा, ऐसा मेरा मानना है। 
    जैव विविध्ता के मामले में इंडोनेशिया बेजोड़ है। अद्भुत जैव विविध्ता से भरपूर हजारों सुन्दर द्वीपों, मनमोहक और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इण्डोनेशिया सांस्कृतिक दृष्टि से समृ( होने के साथ-साथ विश्व के श्रेष्ठ पर्यटक केन्द्रों में शुमार है। चाहे एक करोड़ से अध्कि जनसंख्या वाला जकार्ता हो, जहाँ पर विविध् ध्र्मों, आस्था, संस्कृतियों, जीवन शैलियों का दर्शन होता है या पिफर बाली के विश्व के सुन्दरतम समुद्र तट हों अथवा वोनबर्न एवं प्रबनन के सुन्दर मंदिर हों अथवा सुमात्रा की अद्भुत समुद्रीय जैव विविध्ता हो या पिफर योगयकार्ता में रामलीला का विश्व प्रसि( मंचन हो, आपके पास इण्डोनेशिया जाने के सैकड़ों कारण हैं। इण्डोनेशिया के विषय में कहा जाता है कि अगर इण्डोनेशिया घूमने में पूरा जीवन भी लगा दिया जाये तो भी आप सम्पूर्ण इण्डोनेशिया शायद ही देख पाएँ। यह देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा कि इण्डोनेशिया अपने आप में हजारों मंदिरों का देश है। यहाँ का हर मंदिर अपनी कलात्मकता के लिए प्रसि( है तथा हर मंदिर का अपना स्वयं का इतिहास है। 
    योगयकर्ता के प्रवास के दौरान कई लोगों ने मुझे सुझाव दिया कि मुझे इण्डोनेशिया पर लिखना चाहिए। विशेषकर इण्डोनेशिया दूतावास में संस्कृति, शिक्षा काउंसल डाॅ0 इवान प्रोनोटो, विश्वभारती विश्वविद्यालय शांति निकेतन की निदेशक डाॅ0 सवजुली सेन और सर्जनवीयता विश्वविद्यालय की वाइस रेक्टर डाॅ0 यूलिया से इस विषय पर गहन चर्चा हुई। भारत से हजारों मील दूर 16 सितम्बर 2017 की रात्रि को जब हमने 9वीं शताब्दी के प्रबनन मंदिर के प्रांगण में बैठकर भगवान श्री राम के जीवन का सजीव चित्राण देखा तो मैंने निश्चय किया कि इस श्रेष्ठ देश के महान लोगों की अजर-अमर संस्कृति को लोगों के सम्मुख लाने का प्रयास करूँगा।
    यह संस्कृति, युगों से हमें जोड़े हुए है और आगे भी जोड़े  रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसलिए यह आवश्यक है कि ‘पीपुल्स टू पीपुल्स कान्टेक्ट’ के लिए हम एक दूसरे को समझें। इसी प्रयास के रूप में आज यह पुस्तक आपके हाथों में है। मैं इण्डोनेशिया की इस ऐतिहासिक यात्रा में जहाँ विदेश मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय सांस्कृतिक संबंध् परिषद का आभारी हूँ, वहीं इण्डोनेशिया के दूतावास का हार्दिक आभारी हूँ। दूतावास के सांस्कृतिक शैक्षिक प्रभारी डाॅ0 इवान प्रानोतो ने मेरे घर आकर जिस अंदाज में मुझे आमंत्रित किया तो मुझे उनकी संस्कृति का प्रथम साक्षात्कार वहीं पर हो गया था। सर्जनवीयता विश्वविद्यालय का पूरा आयोजन बहुत अद्वितीय था। सम्पूर्ण आयोजन में प्रेम, नम्रता और आतिथ्य भाव का अद्भुत संगम देखने को मिला और इस बात की चर्चा मैंने अपने व्याख्यान के दौरान भी की। अपनी कृतज्ञता को मैं आयोजकों तक कितना पहुँचा पाया यह वही जानते होंगे, परन्तु इस पुस्तक के माध्यम से मैं समूची टीम को पुनः साध्ुवाद देता हूँ। 
    इस सेमिनार का आयोजन इंडोनेशिया सरकार का संस्कृति शिक्षा विभाग, इंडोनेशिया दूतावास, भारत सरकार का विदेश मंत्रालय और तमान सिस्वा सर्जनवीयता विश्वविद्यालय मिलकर कर रहे थे। मैं सभी आयोजकों को बेहतर परस्पर समन्वय के लिए हार्दिक बधई देना चाहूँगा। मैंने महसूस किया गुरुदेव की 90वीं वर्षगांठ मनाने के और इस सेमिनार का मुख्य उद्देश्य हमारे दोनों राष्ट्रों को परस्पर निकट लाना है। आयोजक अपने इस उद्देश्य में सपफल रहे। 
    इस पुस्तक में जहाँ मैंने इंडोनेशिया-भारत की प्रगाढ़ मित्राता, सामरिक साझेदारी का उल्लेख किया है वहीं इण्डोनेशिया की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक पक्ष को सुध् िपाठकों के समक्ष रखा है। मैंने इंडोनेशिया की संस्कृति, शिक्षा, परम्पराएं, इतिहास और इस देश की विकास की कहानी को पाठकों से साझा किया है। मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार इंडोनेशिया ने सदियों पुरानी अपनी संस्कृति को जीवित रखा है। मुझे लगता है कि जीवित ही नहीं बल्कि उस संस्कृति को पुष्पित-पल्लवित करने में इण्डोनेशिया के लोगों ने सपफलता पायी है। आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में इंडोनेशिया की सपफलता का मूलमंत्रा विविध्ता में एकता वाली संस्कृति में समाहित है। मैंने इस पुस्तक के माध्यम से इस देश के लोगों की विनम्रता, उनका पुरूषार्थ, समरसता, परस्पर प्रेम, एकता में अनेकता और आपसी सौहार्द जैसे मानवीय गुणो को पाठकों के सम्मुख रखने का प्रयास किया है। साथ ही बदलते विश्व परिदृश्य में भारत-इण्डोनेशिया की सामरिक मित्राता, बढ़ते व्यापारिक रिश्तों के साथ-साथ एशिया में इंडोनेशिया-भारत की बढ़ती भूमिका और दक्षिण पूर्व प्रशांत क्षेत्रा में विश्व शांति स्थापना में दोनों देशों की साझी नीतियों और उनके योगदान की चर्चा की है। 
    मेरा मानना है कि भारत और इंडोनेशिया के बीच सरकारी सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ लोगों में आपसी संपर्क बढ़ाने की आवश्यकता है। हमें समझने की आवश्यकता है कि हम दोनों देश विश्व के बड़े जनतांत्रिक देश होने के साथ विश्व के दो बड़े ध्र्मों का प्रतिनिध्त्वि करते हैं। 
    इस्लाम और हिन्दू ध्र्म के सबसे बड़े देश होने के साथ-साथ हम साझी भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पित हैं। यह हमारी मजबूती है कि सम्पूर्ण वैश्विक जनसंख्या का एक चैथाई से ज्यादा भाग इन दोनों राष्ट्रों में निवास करता है। अगर समूचे विश्व में भारतीय संस्कृति के प्रभाव की बात करें तो त्रिनिदाद, टोबेगों, पफीजी, सेचेल्स, माॅरीशश, भारत, म्यांमार, भूटान, नेपाल, थाईलैंड, बंगलादेश, गीनिया , वेस्टइंडीज, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, कंबोडिया आदि राष्ट्र भारतीय संस्कृति से कहीं न कहीं प्रेरणा ग्रहण करते हैं तथा उसके मूल्यों को अपने जीवन में अपनाते हैं। 
    मैंने यह भी देखा है कि इंडोनेशिया के संबंध् में भारत के लोगों को सम्पूर्ण जानकारी नहीं हैं। लोग इंडोनेशिया की समृ( संस्कृति से पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं। यह इसलिए कि एक दूसरे देशों के लोगों के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं के बराबर है। इस संबंध् में साहित्य का भी अभाव है। विशेषकर, भारतीय भाषाओं और हिन्दी में साहित्य न के बराबर है। हमारे लोगों ने थोड़ा-बहुत  इंडोनेशियांे के बाली द्वीप के विषय में सुना है। वह जानकारी भी वहाँ के पर्यटन तक सीमित है। हमारा संबंध् इससे कहीं अध्कि निकट और प्रगाढ़ है। मेरा मानना है कि हम लोगों को प्रत्येक भारतीय और इण्डोनेशियावासी को आपस में अपनी साझी संस्कृति की कहानी बतानी चाहिए। इसी प्रयास से लोगों के ;च्मवचसम जव चमवचसम बवदजंबजद्ध बीच संवाद स्थापित होगा। भारतीय लोगों के लिए इण्डोनेशिया केवल बाली और पर्यटन तक ही सीमित न रहे। 
    इस पुस्तक से जहाँ पाठकों को इंडोनेशिया के संबंध् में सम्पूर्ण जानकारी हिन्दी में उपलब्ध् हो सकेगी। मेरा यह विश्वास है कि मेरी इस कृति से दोनों देशों के लोगों को एक दूसरे के निकट आने में मदद मिलेगी। मेरी कोशिश रहेगी कि इण्डोनेशिया की भाषा तथा अन्य भारतीय भाषाओं में भी इसका अनुवाद हो। 
    मेरे इस प्रयास से भारत-इंडोनेशिया के लोगों को और नजदीक लाने में अगर तनिक भी मदद मिलेगी तो मैं अपना यह प्रयास सार्थक समझूँगा।