Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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तुम भी मेरे साथ चलो

          श्री निशंक नई पीढ़ी के उदीयमान कवि के रूप में अपनी जो छवि बना रहे हैं, उससे बड़ा संतोष मिलता है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उनकी कविता एक अमिट प्रभाव पैदा करने की क्षमता रखती है। एक युवा व्यक्ति को जीवन में प्रवेश करते हुए जीवन का जो पहला-पहला अहसास होता है, वह निशंक की कविताओं में पूरी संभावनाओं के साथ उभरा है                                            

          आज के जगत की कुटिलता की विषम छाया उनकी कई कविताओं में व्यक्त हुई है। कैसा काल आया में बदलते हुए मानव और उसके समाप्त प्राय जीवन मूल्यों के सामने एक कटु प्रश्न प्रस्तुत करती है। कवि का जीवन बोध् उसे जगत् की सही प्रतीति करने में सहायक होता है और पिफर शुरू होती है वास्तविक मानव की तलाश ‘मानव कहां है ? विचरण में उसे लगता है -

‘ये मानव, ये जंगल,
ये पर्वत, ये हवायें,
सब किराए के हैं।
ये जंगल खाने को दौड़ते हैं,
ये पत्थर मारने को भागते हैं।’

          आत्मीयता के अभाव में वह अपने पास एक ऐसी दुनियां को पाता है जो उसकी अपनी नहीं है, आत्मपरायापन की स्थिति उसे निरन्तर कचोटती है।
          इस स्थिति ने कवि को अकेलापन और पीड़ा प्रदान की है। संग्रह की कई कविताओं में पथ की विकटता, चारों तरपफ लगी आग, अन्याय, सम्बन्ध्हीनता आदि भावना की तीव्रता के साथ प्रकट हुए भाव हैं, जो मन प्राणी को स्पंदित करते हैं

‘कौन ज़ख्म ऐसा कि,
मुझ पर न ढाया गया।
कौन दर्द ऐसा जो
मुझ तक न आया गया।

          ‘दुख की धरा’ का अहसास बार-बार इन कविताओं में बोलता है कि दुख क्या है ? कैसे और कहां से आया है। यह जिज्ञासा भी इन कविताओं में व्यक्त हुई मिलती है। किन्तु एक अच्छी बात यह है कि इन कविताओं में दुख का पूजन नहीं है। दुख के कारण तो तोड़ने का आग्रह मुख्य है और साथ ही अपने दुःख को दूसरे के दुःख में मिलने की भावना:-

‘तुम न मिलते, प्रिय न मिलता,
जीवन का यह पुष्प न खिलता ।
आज खुशी का दिन है मेरा,
मैंने दर्द अपनाया तेरा ।
छोड़ो कैद पड़ी पीड़ा को,
इसको मेरे संग बहने दो ।

          इस प्रकार पीड़ा से जूझने और बांटने का भाव इस कवि को रोमानी बनाने से बचाता है।
इसी पीड़ा के बीच से सम्भवतः कवि के मन में दृढ संकल्प जागते हैं और यह व्यक्ति और समाज में अग्रसर एक जुझारू तेवर लेकर लड़ने को सन्न दीखने लगता है।