Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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बस एक ही इच्छा गढ़वाली अनुवाद

          डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का हिन्दी मा लिख्यां कहानी संग्रै ‘बस एक ही इच्छा’ कि कहानी पढ़नौ मौका मिले। यूं कहान्यूं तैं पढ़ना बाद मेतैं लगि कि यूं कहान्यूं मा सैरा पहाड़ै कथा समाईं छ। त् मन मा बिचार आई कि यूं कहान्यूं तैं अगर गढ़वळि भाषा मा अनुवाद कर्ये जा त कहानी हौरि बि असरदार साबित ह्ने सकदन्। किलैकि कहानी का पात्रा, वूंका चलैतर, वूंका मिजान, भावभूमि का द्यखणन् यो पहाड़ का आम मनखि कि कथा-बिथा छन। यूं कथौं तैं अगर अपड़ी भाषा मा बंच्ये जाव त इनि छपछपि कै हैंकि भाषा मा नि ऐ सकदि।
          ये संग्रै मा कुल दस कहानी छन। तकरीबन सब्बि कथौं मा पहाड़ै खौरि छ। ‘बस एकी गाणि’ नौं कि कहानी इना मनखि कि कथा छ जु होटलम् काम करिक अपणा घर-परिवार तैं पळनूं छ। परदेस मा अपड़ा मुल्क्या मनखि का निब्त ज्वा अपणैंस औंद, वांकि सच्चै बयान कर्दि या कहानी।
          मनखि समाज मा रैण वळो प्राणी छ। जनि-जनि वेको रळौ-मिसौ बनि-बन्या समाजु दगड़ा होणू रैंदु, तनि-तनि वेका बिचार बदलेण बैठ जांदन। ‘मि अर तु’ एक सुपिन्या अर वांसे उपज्यां भरमणा कि कहानी छ। नायक शशांक सुपिन्या मा देखदु कि वे अर दीप्ति तैं मिलण मा समाज मा जात-पात, अमीरि-गरीबी कू अड़ंगा लगणू छ। त भैर सैर-बजार मा रौण वळि दीप्ति अपणा भित्रौ केर से भैर नि औंण चाणी छ। इना मा भित्रा-ई-भित्रा घमसेंदा शशांक कि पिड़ा तैं दर्शांद या कथा।
          ‘कथगा खौरि हौर’ मा जीवट श्वेता अर वींका भै-समान रमेशै कथा छ। श्वेता गरीबि मा परिवार बी पळनीं छ। बादम् नौकरी लगदि पर जब अफ्रवी बिमार ह्नवे जांद त परिवार पफेर संकट मा ऐ जांद। इन मा ध्र्म-भै रमेश वूंकि मदत का वास्त ऐथर आंद...।
           ‘आखिर कत तलक’ कहानि इन लगदो कि लिख्वार कि जीवनी से प्रेरणा ल्हेकि निकळयां कै पात्रा कि कथा छ। जैतैं लगदो कि वो भारत-माँ कि सेवा कन्न चाणू छ। अर अपडत्री माँ कि किरपा से ऐथर बढ़ण चाणू छ। या देशभक्ति कि भौत अच्छि प्रेरक कहानी छ।
           ‘कैमा ना बोल्यां’ इना गरीब आदिमै कहानि छ, जैका द्वी ब्यो छन। घौर बिटि भग्यीं अपड़ी घरवळि तैं वापिस ल्हौंणों नोटिस ल्हेकि वो अखबार का दफ्रतर मां औंद, पर वख समझये जाण पर जब वैतैं पता चलदो कि ये नोटिस से वेन आपफत मा पोड़ि जाण त् वो अपणा घौर वापिस चलि जांद। जांद-जांद हतजुड़ै बि कर्द कि स्साब ‘कैमा न बुल्यां।’
‘देश का खातिर’ एक पफौजी का साहस कि कहानी छ, जो कन्नि से कनि आपफत औण पर बि ऐथर बढ़दि गै। ‘नयु जीवन’ इना मनखि कि कहानी छ, जो यकुलकार रैंदु छौ। पर अचणचक एक दिन एक गरीब ठंडन अल्डकर्यां मनखि का जीवन तैं देख्यी वेका बिचार बदलि जांदन अर वो भलु आदिम बणि जांद। 
           ‘राध’ आज का बदलैंदा जमना मा हरेक बेटि-ब्वारि कि मानसिकता दर्शांण वळि कहानि छ। जख लोग अफ्रवी अपफ तक सोच सकणा छन। इख राधा छ। एक द्विया झणौं का झगड़ा मा राध को हृदै बदल जांद अर वा अपणि सासू अर द्यूर तैं ल्हेंकि देरादूण अपफु दगड़ा ल्हैकि एक नई शुर्वात कर्दि।
          इनि ‘सुख-दुख’ मुजर निराला का जीवन मां अयां बदलौ कि कहानि छ। एक मिलनसार मनखि का मन मा कैं बातन् कया ह्ने जाव, नि बोल्ये सक्येंदु। जन ईं कहानि मा छ।
          ‘अपणा-बिराणा’ घर परिवारूं कि मानसिकता अर परिवारिक रिस्तौं कि कथा छ। ब्वारि का परति सासु अर सौरास्यूं को बिवार आज बि पुराणि मान्यतौं से जकड़्यां छन, इना मा कै ना कै दगड़ा अन्यो त होणी छ। इना मा राहुल जना मनखि बि छन, जैकि वास्ता अपणा-बिरणा सौब एक समान छन। पर अपणा-बिरणौं कि पिड़ा मैसूस कन्न वळा आज अंकळ्यूं मां गिण्न ल्हैक छन।
           डाॅ0 निशंक कि कहान्यूं मां मिन एक खास बात मैसूस कर्ये कि वूंकि कहानी मा कै ना कै बाना पर पात्रा को मन बदल ह्ने जांद अर वो भलै का बाटा पर पैटि जांद। बिगर कुछ अंगळति कर्यां अर बोल्यां। वूंकि हरेक कहानी क्वी ना क्वी रैबार जरूर देंदि। हरेक कहानी का भ्त्रिा ‘आस’ जरूर छिप्यीं छ। ज्वा पढ़दरा का भित्रा अच्छो हर सुल्टो असर पैदा कर्द।
           विषयवस्तु का हिसाबन् ई कहानी सामाजिक अर पारिवारिक कहानी छन। जयांकू ध्यो छ मनखि अर मनख्यात कि भलै। जादातर कहान्यूं मां पहाड़ छ अर दगड़ा मां पहाडै़ पिड़ा, खौरि अर त्याग जख-तख उकर्यूं छ। पर आत्मसम्मान अपड़ि जगा छ।
            राजनीतिक रूप से इतगा व्यस्त होणाअ् बाद बि डाॅ0 निशंक कि कहान्यूं मां संवेदना पक्ष भौत दमदार छ। वो यखै बेटि-ब्वार्यूं कि पिड़ा, खौरि अर वूंका मयाळुपन तैं उकेरिक सामणि ल्हौंदन। एक अच्छा कहानीकार कि या भौत बड़ि खासियत छ। यांसे पता चल्दो कि लिख्वार का रूप मां ‘निशंक’ जी का अपणि माटी से सरोकार कतगा गैरा छन। उतर्ग गैरि छ वूंकि संवेदनशीलता बि।
           गढ़वळि भाषा ये बग्त अपणा भाषाई विकास का बाठा पर छ। ये ठिया पर प्रदेश का मुख्यमंत्राी जना लिख्वार कि पुस्तक का अनुवाद कन्न से अच्छि बात हौर क्य ह्ने सकदि...!
            जख तक भाषा कि बात छ त गढ़वळि भाषा कु हजमा भौत अच्छो छ। कहान्यूं तैं हिन्दी बटि गढ़वळि मां ल्हौंण मां कखि-कखि यू मिजान का हिसाबन् मामुलि सी भावानुवाद कन्न पड़े। इलै बाजि जगौं यू कथ्य घट-बढ़ गैने। अनुवाद कन्नो ह्नयूं छ, ई त विद्वान छांट-निराळ कन्न वळा बताला या त जणगूर पढ़दरा। ...जुगराज रयांन्। आस जगौंदि यूं कहान्यूं तैं पढ़दरा पसंद करला, इनि आस जरूर छ।