Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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नवांकुर

‘‘कवित्वं दुर्लभं लोके शक्तिस्तत्रा सुदुर्लभा’’

          श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी की यह पुस्तक उनकी दूसरी कृति है। इससे पूर्व वे ‘समर्पण’ नाम का काव्य संग्रह समाज को दे चुके हैं जिसकी पाठकों ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की। इन दोनों में दी गई भावना-भरित रचनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ‘वीर ग्राही’ राष्ट्र के प्रति सचेतक है। यह चेतना उसकी मौलिक है तभी तो वह चाहता है।

‘उदसी सूर्यी अगादुदिदं मायकं वचः’ (अथर्व 1.29.5)

          जैसे सहस्रों किरणों वाला सूर्य उदय होता है उसी प्रकार राष्ट्र के लिए मैं भी उदित हुआ हूँ। मेरे द्वारा कृत सभी कार्य राष्ट्र के लिए हों। ज्ञान प्रत्येक को नहीं केवल प्रवीरण तपरत साध्क को ही होता है। साध्क माँ सरस्वती की भक्ति विद्वान बनने के लिए सचेष्ट होकर साध्किार कर सकता है। मैने माँ की भक्ति बड़ी की जिसने मेरी हर रचना में मृदृल शब्द की पफूलझड़ी की ।

‘शब्द कोश’ वाणी-पाणी का
माँ का दूध् समझ पी डाला ।
और पाणिनी के सूत्रों का
मंथन कर मध्ु अर्थ निकाला ।
विरस शब्द आया कोई तो
उसको मैने खड़ी-छड़ी की ।(कमल)

          साध्किार ऐसा कह सकने में आयु बीतती है जबकि अभी ‘निशंक’ बाल साध्क है पिफर भी उनकी रचनाओं में उत्तरोत्तर गामी भाव प्रगति का परिचायक है। कवि सनातन प्रजा में वाणी का प्रेरक होता है। निशंक में अभी से अपनी इस छोटी सी आयु के बावजूद भी यह चेतना है। इसी चेतना के बल पर कवि ने ‘नवांकुर’ की प्रथम कविता में ही अपने सहयोगियों को प्रबोध्ति किया:-

याद मुझे उस कंटक वन की
जिससे होकर निकला हूँ,
विपदानल की ज्वालाओं में
सदा मोम सा पिघला हूँ।

          यह शब्दावली सहजता से अंदर निगल देने वाली नहीं है, कवि ने क्रतुमय पुरूष की तरह सहत्रों विष की प्याली पी, अग्नि स्पफुलिगों से लड़कर आगे आया तो कंटीली झाड़ियों की चुभन सही है। कवि स्वयं कहता है:-

बाधओं की चट्टानों से प्रगति मार्ग अवरूद्ध रहा
कौन कष्ट है शेष जगत में, जो नित मैने नहीं सहा?

इसलिये कवि को आशीर्वाद देता हुआ मेरा शान्त्वना की दृष्टि से कथन है:-

‘ध्ध्कती अग्नि में तपकर ही सोना कुन्दन होता है।’
रगड़ पानी में जो गंध् दे वही चन्दन होता है। (कमल)

          राष्ट्रीय परख होने से समर्पण की सहज लोकप्रियता से ही ‘नवांकुर’ अंकुरित हो गया। कवि ने कविता के दूसरे छन्द में सांस भरते हुये अपने मन का ज्वर बाहर निकाला:-

ठोकर ने तो मार्ग दिखाया कंटक पुष्प सुगन्ध् बने ।
तूपफान बन गया मृदुतम पर्वत गाते छन्द बने ।

कवि को अब विश्वास है कि थके हुये उफंध्ते पाथिक को ढांढस बाँध्ने वाला प्रेरक बनकर कह सकता हैः-

संकट चाहे जितने भी हों, विजयगीत वे बन जाते ।
लोहे की जंजीरों में, मुस्कान कमल की ही पाते ।

          दसवीं रचना में कवि का उदात्त साहस सामने आता है। जग-जीवन बढ़ाने वालों को ढांढस देता हुआ बड़ी सुन्दरता और साहस से कवि कहता हैः-

कांटों की शैया में जिसने कोमलता को छोड़ा ना।
चुभन पल-पल होने पर भी साहस जिसने तोड़ा ना ।

          यहां ‘कोमलता’ शब्द से कवि का अभिप्राय हृदय की उस तप्त उफष्मा से है जिससे दूसरों के लिए स्नेह की बूंदें झरती हैं। कवि अपने स्वजन-मित्रों एवं पाठकों को संघर्ष करने की प्रेरणा देता हुआ कहता है।

जो विकसित संघर्ष में होता कांटों से लोरी सुनता ।
धैर्य सदा ही मन में रखता, विपदा से भी ना डरता ।

          निःसंदेह संघर्ष मानव का जीवन दर्पण है। मनुष्य ने माता के गर्भ से ही संघर्ष की वर्णमाला सीखी है। संघर्ष मानव को उठना सिखाता है। जहाँ हम हैं वहाँ से ‘आगे बढ़ना’ की शिक्षा देता है। अथर्ववेद (मंत्रा 8-1-4) कहता हैः-

‘उत्क्रायातः पुरूष भाव पत्था।’

हे मनुष्य! संघर्ष कर आगे बढ़। नीचे मत गिर। वेद तो यहाँ तक कहता हैः-

‘मृत्योः पड्वीश यव मुंचमानः’

मृत्यु के पाश को भी तोड़ता हुआ आगे बढ़ । यह सब कुछ बढ़ना, उन्नति करना, संघर्ष के बिना सम्भव नहीं हैं:-

संघर्ष से सांपों को नचाता है सपेरा,
सागर की तरंगों में भी संघर्ष चला है ।
संघर्ष बिना जीने से मरना ही भला है। (क्राँतिदीपद)

          संघर्ष किये बिना मनुष्य का जीवन ही नहीं चल सकता। निशंक जी ने अपनी कविता में संघर्ष की बड़ी मार्मिक बात कही है। क्योंकि मनुष्य पालने में झूलने या पफूलों की शैया में सोने नहीं आता। यह संसार कर्मक्षेत्रा है और कर्म संघर्ष बिना कभी सपफल नहीं होता। अत्यध्कि प्रसन्नता का विषय यह है कि निशंक की पीढ़ी के कवि जिस प्रकार बिना वर्षा के सूखी बाढ़ ला रहे हैं, निशंक ने अपने कवि कर्म को सर्वथा पृथक रखा और मान पाया है एक नवोदित कवि की प्रथम पुस्तक को इतना सम्मान मिलना बड़े श्रेय की बात है। कविकर्म बड़ा कठिन होता है, वह दुर्लभ शक्ति से ही सम्पन्न होता है। ‘व्यंग्य-हास्य’ लिखने पर निशंक ने अपना मेध शक्ति का दुरूपयोग नहीं किया है। उसने जो पथ अपनाया है वह बोध्ी जनों का पथ है। संगीत का प्रभाव भी मनुष्य पर पड़ता है। रमेश प्रायः उस भूमि का निवासी है जिसके लिए पुराणकार कह गये हैः- और इसी भूमि के विभिन्न केन्द्रों में वह कार्यरत भी रहा और अब भी है। वेद ने इस भूमि को सुवर्ण, धन और रत्न की खानों वाला स्वर्ग कहा है।

‘निधि विभ्रती बहुध गुहावमु’ (अथर्व 12.2.44)

          श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ इसी तरह काव्य साध्ना में प्रयत्नशील रहे तो श्रेष्ठतम रचना समाज को दे सकता है। कविता, कल्याणी और आत्मा की तरह अमर होती है जिस कविता से समाज को आत्मबोध् हो उसी कविता को आत्मज्ञानी अमर ज्योति कहते हैं।

‘समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षेत’

          अर्थात् जीवात्मा को ज्ञानी कवि हृदय की भक्ति ;साध्नाद्ध और लगन शक्ति से देखते हैं। संसार समुद्र के अन्दर प्रत्येक पदार्थ को कवि की दिव्य दृष्टि देखती है। जैसे जीवात्मा अनेक भागों से शरीर में आता है और शरीर से पृथक हो जाता है। ऐसे ही कवि सर्वग्राही विषयों को अपनाता है और नारी, वृद्धों की निन्दा करना छोड़ देता है, ऐसा करने वाला सुकवि माना जाता है।