Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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मुझे विधाता बनना है

जातीय चेतना के हरित ऋतुपर्ण

 

          हिन्दी कविता में आधुनिक चेतना का सूत्रपात करनेवाले महान साहित्यकार स.ही.वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने रामायण और महाभारत के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मह्त्त्व को रेखांकित करते हुए एक जगह बहुत सुन्दर बात कही है कि महाकाव्य केवल वीरगाथा नहीं होता, वह जिस वीरत्व का वृत्तान्त कहता है , उसका एक मार्मिक पक्ष यह होता है कि ऐसे वीर को इस बात की पहचान होती है कि वह केवल घटना का चरित-नायक नहीं है,वरंच उसका नियति-पुरुष  है। उसके कर्म में केवल घटना नहीं घट रही है,बल्कि नियति घटमान हो रही है,विधि-विधान सम्पन्न हो रहा है। काल के इस आयाम के गहरे बोध के बिना ‘एपिक’ का एपिक चरित्र नहीं बनता। उसका महत्त्व,और समूची जाति के लिए तथा जातीय संस्कृति के लिए उसका सबसे गहरा अर्थ इसी आयाम की पहचान में होता है। इ्सी सन्दर्भ में अपने समकालीन वामपंथी साहित्यकारों से एक बल्ली ऊपर उठकर, बड़े ही स्पष्ट शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की तह तक जाकर वे कहते हैं कि ‘स्वाधीन भारत के राजनीतिक जीवन की यह विडम्बना रही है कि उसने धर्मनिरपेक्षता की भ्रान्त परिभाषा करके उन्हीं उदार तत्त्वों को नकारा है जो साम्प्रदायिक संकीर्णता, असहिष्णुता और अलगाववाद से मुक्ति का एक वास्तविक और टिकाऊ आधार दे सकते। भारतीय धर्म ही संसार का एकमात्र धर्म है,जो स्वयं धर्म-निरपेक्ष है।’ वे भारत में मिश्र संस्कृति की तलाश की कोशिशों को हास्यास्पद और खतरनाक मानते हुए कहते हैं--‘सहज विकासमान संस्कृति की एक और केवल एक परम्परा होती है:एक प्रधान नदी की भाँति वह अनेक नदियों के जल ग्रहण करती हुई एक जीवनधारा का रूप लेकर आगे बढ़ती है।उसमें अलग -अलग जलों के गुणों का संयोग ही पहचाना जा सकता है,पर जल अलग नहीं किये जा सकते।’

          अपने चिन्तन और व्यक्तित्व में सम्पूर्ण देश-काल को समेटनेवाले ‘अज्ञेय’ के ये विचार यहाँ पर मिझे इसलिए याद आये कि एक तो यह वर्ष उनका जन्मशती वर्ष है, और दूसरा इन मुक्त विचारों को पढ़ने के बाद यदि इस संग्रह की कविताओं को पढ़ा जाय,तो इसके रचनाकार को जो लोग संकीर्ण राजनीतिक नजरिये से देखने के आदी हैं ,वे अपने को सुधारते हुए जातीय संस्कृति की उद्दाम भावनाओं से नि:स्यूत इन कविताओं के विराट परिप्रेक्ष्य को समझ सकते हैं। ‘मुझे विधाता बनना है’ संग्रह की कविताओं को मैं तब पढ़ रहा हूँ ,जब उत्तराखण्ड की उपत्यकाओं पर आषाढ़ के जमुन-जल मेघ छाये हुए हैं, मेरे सामने मंजरियों से लदे हरे-भरे रुद्राक्ष के वृक्ष पर दर्जनों तोते अपनी लाल-लाल चोंचों से प्रणय-संवाद कर रहे हैं, वसन्त ऋतु में सुरीले स्वर में गाकर अपनी प्रिया को रिझानेवाला कोयल अब अपनी पूछ न होने पर चीखने-चिल्लाने लगा है, वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूँदों को अपने आँचल में समेटे पुरवा हवा धीरे से तन-मन को छूकर भाग जाती है, आकाश से सौगात में मिली फुहारों से भींग रही धरती पुलकित होकर गा रही है,नाच रही है,सीढ़ीदार खेतों में धान की फसलें लहलहाने लगी हैं। ऐसे में पर्वतों पर इस प्रकार की कविताओँ का उगना स्वाभाविक है:

बुग्यालों की हरी मखमली घास पर

मिलना ऐड़ी-आछरियों के वास पर

मन का बर्फ़ पिघल उट्ठा मनुहार से

पीला चाँद उगा है पर्वत पार से।

 

          मगर ‘मुझे विधाता बनना है’ संग्रह की कविताएँ पर्वत पार से नहीं,बल्कि पर्वतीय गाँवों की ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से गुजरकर हम तक पहुँची हैं और सारे देश की पीड़ा और उल्लास को अपनी तलहथी पर मेहँदी की तरह रचाकर हमें रिझा रही हैं। पूरी सृष्टि नया रूपाकार लेने के लिए आतुर होकर सतरंगे ऋतुपर्णों से सज-सँवर रही है, उन्हें सिरजनहार की कृपा-कोर चाहिए; चट्टानों के भीतर से यक्षिणियाँ  बाहर निकलने को आकुल हैं,उन्हें शिल्पकार के कुशल हाथ चाहिए, कविताएँ खेतों-खलिहानों से लेकर मन्दिर के हेमाभ कलश तक सूरज की केसरिया किरणों जैसे बिखर जाना चाहती हैं, उन्हें शब्दों के साँचे में ढालने के लिए कोई कवि चाहिए। कवि जो मनीषी है, कवि जो अपनी संस्कृति और अपने संस्कारों को जीता है।ऐसा कवि ही सही अर्थों में विधाता है, जो ब्रह्मा से भी बड़ा है,क्योंकि ब्रह्मा के निर्मित राम नियति के विधि-विधान को पूरा कर न जाने कबके सरयू की जलधारा मे तिरोहित हो गये,लेकिन वाल्मीकि के सिरजे हुए राम आज भी घर-घर में विद्यमान है। रचनाकार निशंक में वाल्मीकि- तुलसी जैसा विधाता बनने का शिव संकल्प है। वे महाकाव्य न लिखकर भी जातीय संस्कृति के विस्तृत आयाम को भलीभाँति पहचानते हैं,उसके गहरे अर्थों को जानते हैं। उनकी कविता के ये ही तत्त्व दूर-दूर की भाषाओं के लोगों को आकर्षित करते हैं।यही कारण है कि आज उनकी रचनाओं का अनुवाद अन्य समकालीन रचनाकारों से कहीं ज्यादा हो रहा है। देश-विदेश के लोग अपनी भाषा में उनकी कविताओं को पढ़कर भारत की सामासिक संस्कृति, इसके राग-रंग, निरंतर आगे बढ़ने के उल्लास-उमंग,इसके दुख-दर्द और इसकी आध्यात्मिक समृद्धि की भागीरथी में अवगाहन करते हैं।

          विधि-विधान ने ‘निशंक’ को एक संघर्षशील अध्यापक से एक नवोदित राज्य का मुखिया बना दिया,जिसके कारण उन्हें अपने सार्वजनिक जीवन की अपेक्षाओं को संतृप्त करने के लिए समय और ऊर्जा का आखिरी कण तक समर्पित कर देना पड़ता है,मगर इसके बावजूद लेखन के प्रति आंतरिक प्रतिबद्धता-वश वे कविता-कहानी लिखने  के लिए कुछ समय और ऊर्जा उसी तरह बचा लेते हैं,जैसे गाय अपनी बछिया के लिए थन में दूध बचाती है।सृजन के प्रति दृढ़ संकल्प इस संग्रह के शीर्षक में ही समाया हुआ है। ‘मैं विधाता बनना चाहता हूँ’ और ‘मुझे विधाता बनना है’ में जो अंतर है,उसे कोई भी पाठक आसानी से समझ सकता है। जीवन में मिले काँटों और फूलों को समान रूप से अंगीकार करते हुए ‘निशंक’ इसी संग्रह की एक कविता में कहते हैं:

 

मेरे गीतों के स्वरों ने सबका नव शृंगार किया

सम्मानित हों या अपमानित, पर संघर्ष स्वीकार किया।

          इस संग्रह की कविताओं में आसपास के परिवेश को एक कर्ता के दृष्टिकोण से देखा गया है,छोटी से छोटी वस्तु को पूरे वत्सल भाव से उठाकर शब्दों के खाँचे में रखा गया है,जैसे बाघिन अपने बच्चे को उठाती है, जैसे बादल समुद्र के जल को उठाता है।बहुत सारी बातें वे संकेतों में कह जाते हैं:

 

कुछ सपनों में खोया था

जाने क्यों मैं रोया था।

पल में यहाँ-वहाँ जाना

किन्तु नहीं कुछ भी पाना

देखा सबने सोते मुझको

कहाँ एक क्षण सोया था ।

 

          अपने जीवन की विवशताओं को, विसंगतियों को, कटु यथार्थ को किसी गीत में बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से कैसे कहा जा सकता है,इसका एक सुन्दर उदाहरण है यह। आज की परिस्थिति में सार्वजनिक जीवन को जीना आखिर काँटों की सेज पर सोना ही तो है! उसमें नींद न आने पर भी सपने देखना होता है और उन सपनों को साकार करने के लिए शुक्रतारा उगने से पहले ही उठकर चल देना पड़ता है। इस पीड़ा को बड़े ही मार्मिक शब्दों में उन्होने ‘मन ही मन रोया’ कविता में व्यक्त किया है:

 

रात को थककर चूर बैठा

और मन-मन खूब रोया

अश्रुधारा को पिये ही

शान्त भूखे पेट सोया

 

          ऐसा जीवन वही सेनानी जीता है,जिसे अपने कर्तव्यों का ज्ञान है और जिसमें अपनी धरती की तकदीर बदल देने की तड़प है।ऐसा व्यक्ति ही दावा कर सकता है कि ‘मैं वह प्रात हूँ जिसने तूफानों से उजड़े खंडहरों को गाँवों में बदला’ और यह भी कि :

 

घर-घर में खुशहाली होगी,मंगल गाया जायेगा

बलिदानों की गाथाओं को पल-पल गाया जायेगा।

 

          आप स्वयं इन कविताओं से गुजरिये और आपको महसूस होगा कि आप अपने गाँव-घर से गुजर रहे हैं।वह गाँव-घर जो अन्नदाता होकर भी और हज़ारों वर्षों की संस्कृति को अपने सीने से लगाकर भी कहीं न कहीं उपेक्षित और वंचित अनुभव कर रहा है। जनवादी होने का नकली तमगा लगाने वाले देखें कि ‘निशंक’ किस तरह अपने टूटे-फूटे शब्दों में देश के वंचित और उपेक्षित समाज की निरीहता को वाणी देते हैं,जब वे कहते हैं:

 

पशु-पक्षी,मानव न था

नहीं देव कोई नारायण

जो लिपटा सहारा देने

वह छोटा-सा पत्थर था।

 

          ये पंक्तियाँ रवीन्द्र नाथ ठाकुर की उस कविता की याद दिलाती हैं,जिसमें सूर्य ढल जाने के बाद अंधकार को काटने में सहारा देने के लिए एक मिट्टी का दीप हाथ जोड़कर उठ खड़ा होता है। जीवन और सिरजनहार के प्रति गहरी आस्तिकता कविगुरु रवीन्द्रनाथ की कविताओं में जितनी है,उतनी ही कवि ‘निशंक’ की कविताओं में भी है। रवीन्द्रनाथ ने एक कविता में वन के मुक्त पंछी और पिंजरे में कैद पंछी के भावों और विचारों का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। परदेशी विचारों के पिंजरे में बंद कवियों में और ‘निशंक’ जैसे मुक्त गगन के पंछियों के विचारों और भावों में भी वही अंतर है।‘निशंक’ के पास अप्नी खुली दृष्टि है,अपनी लेखनी है और अपने शब्द हैं।राजनीतिक जीवन की क्षणभंगुरता से वे भलीभाँति परिचित हैं । उन्हें पता है कि अमरता और आनंद प्राप्ति का सही स्थान साहित्य ही है,जहाँ कोई भूतपूर्व नहीं होता।सम्राट अकबर के लिए भूतकाल की क्रिया लगती है,जैसे ‘अकबर ने कहा’।मगर उसी काल के तुलसी जो ‘सम्राट’ नहीं थे, महज ‘दास’ थे,आज भी वर्तमान काल में ही प्रयुक्त होते हैं—‘तुलसी कहते हैं’। यह इसलिए कि कविता का नीड़ सत्य के तिनकों से बुना होता है।रवीन्द्रनाथ ने एक निहायत अंतरंग पत्र में स्वीकार भी किया है—‘जैसे ही मैं कविता लिखना शुरू करता हूँ,वैसे ही मैं अपने चिरंतन वास्तविक ‘स्व’के भीतर प्रवेश करता हूँ—मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि यही मेरा स्थान है।जीवन में ज्ञात रूप से और अज्ञात रूप सेबहुधा मिथ्याचार किया जाता है,लेकिन कविता में कभी मैने झूठ का सहारा नहीं लिया—यही मेरे जीवन के सभी गहरे सत्यों का एकमात्र आधार है।’ मुझे लगता है कि आज अपने जीवन के बारे में ‘निशंक’ भी यही कहना चाहेंगे।जैसे नेवला साँप से लड़ते हुए उसके जहर को मारने के लिए जंगल की ओर भागता है एक खास जड़ी के लिए, उसी तरह जिन्दगी की कशमकश से थोड़ी देर के लिए राहत पाने वे कविता के मंदिर में चले आते हैं,जहाँ की आरती की कपूरी गन्ध उनके मन-प्राण से सारे विषों को निचोड़ लेती है और वे फिर से जीवन के सर्प-युद्ध में पूरी ऊर्जा के साथ शामिल हो जाते हैं।तभी तो वे कह पाते हैं:

 

तूफान गोद में बिठा

अंधकार को मिटा

सब बेड़ियों को तोड़कर

स्नेह सूत्र जोड़कर

मैं निशंक बढ़ रहा।