Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

Buy NowNext

अँधेरा जा रहा है

    कुँवारी संवेदनाओं की सान्द्र अनुभूतियाँ जब-जब मानस को उद्वेलित करती हैं तो सृजनध्र्मी रचनाकार अपनी भावनाओं को कविता का आकार देता है, यह आकृति उसकी संपूर्ण सृजन यात्रा का ताना-बाना होती है, यों भी रचनाकार अपने सृजन को सन्तति के समान पालता-पोषता है, यह पोषण उसकी आत्मा को परितोष भी देता है और एक शिखर तक आनन्दित भी करता है। 
    कविता का अपना परिदृश्य हैऋ अपने नवीन संदर्भ हैं। इसी वृहद् आकृति से जब छोटी-छोटी अनुभूतियाँ या कहें नई कोंपलें भी बोलने का प्रयास करती हैं तो साहित्यिक भाषा में हम उन्हें क्षणिकाएं कहते हैं। ये किसी मासूम बालक की कोमल भावना के समान भी होती है तो साथ ही इनमें अचूक संप्रेषणीयता की सामथ्र्य भी रहती है, यानि एक समय में अपनी बात को पूरी शिद्दत से अभिव्यक्त करने की अपूर्व क्षमता। मैंने इन्हीं अनगढ अनुभूतियों को जीवन के रसातल से ढूँढ निकालने की चेष्ठा की है। इनमें कोमल कान्त भावनाओं के साथ जीवनानुभवों की कठोरता भी है, मेहनत-, संघर्ष का जुनून भी है तो आस्था और विश्वास की आभा भी विकीर्ण हो रही है, साथ ही जीवन-पथ के उजालों के साथ अंध्ेरे की खिड़कियों को खोलने का प्रयास भी किया गया है। मेरी कोशिश है कि इनमें प्रत्येक सहृदय पाठक और श्रोता अपने-अपने हिस्से का रस लेकर इसे साधरणीकरण की सीमा तक ले जाए। 
    टी0एस0 इलियट, राबर्ट Úास्ट और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आत्मा की मुक्तावस्था कहकर मुक्ति की साध्ना के लिए जो शब्द-विधन कराया है लगभग उसी आवरण में मुक्ति का प्रयास इन क्षणिकाओं में किया गया है। ये संवेदनाएं किसी व्यक्ति-विशेष की नहीं है, अपितु इनमें समाज के संपूर्ण प्रतिबिम्बन का प्रयास किया गया है। रिश्तों की गर्माहट को महसूस करके इनमें विश्वास के           धगों से जिस बुनावट की कोशिश की गई है वस्तुतः आज उसकी आवश्यकता ही नहीं वरन् उसकी खोज भी आरम्भ हो चुकी है। इसका प्रत्यक्ष कारण यह है कि प्रत्येक मानव अपने आप से टूट चुका है और उसके इस खालीपन का उत्तर उसे बाहर नहीं अपितु अपने अंदर ही खोजना है। यह टूटन हम सबकी है। रिश्तों की हम सभी को आवश्यकता है या ये भी कह सकते हैं कि जिन्दगी इनके बिना चल ही नहीं सकती। मैंने महसूस किया है कि विश्वास की परिध् िमें ही संबंधें के बीज बोए जा सकते हैं। इन क्षणिकाओं में भी विविध् रंगी बीजों ने अपना पल्लवन सुनिश्चित किया है। 
    आज हमारे जीवन से आनन्द सूख-सा रहा है और यह प्रक्रिया सतत् गतिमान है। मेरा प्रयास रहेगा कि हम इस प्रवाह को रोक सकें। इस महायज्ञ में हम सभी अपनी-अपनी समिधओं से अपना बचाव कर सकते हैं। मूलतः साहित्य का भी यही दायित्व है।  वह एक ओर हमें अनुशासित करता है तो दूसरी ओर हमें जीवन का शिष्टाचार भी सिखाता है। अपने भीतर के सौन्दर्य और गहराई को निहारने की एक अनूठी प्रक्रिया इन क्षणिकाओं में निरन्तर प्रवाहमान है, साथ ही यह प्राणों की ऊर्जा के अपव्यय का समापन भी करती है। क्षणिकाओं के संदर्भ में यह मेरा पहला प्रयास है। जीवनानुभूतियों के लघुत्तम कलेवर को मैंने इस प्रकार परोसने का प्रयास किया है  कि उनकी कसावट को प्रत्येक सहृदय अनुभव कर सके। यूँ भी संबंधें के संबंध् में अपने ही धगों से बुनावट करनी होती है। शर्तों पर तो अनुबंध् किए जा सकते हैं, जीवन के लिए तो ईमानदारी ही पर्याप्त है। 
यथा-         
    ‘‘रिश्ते निभाने के लिए 
    कहाँ कसमें खानी पड़ती हैं 
    कहाँ शर्तें रखनी पड़ती हैं भारी 
    रिश्तों में होनी चाहिए 
    बस ईमानदारी, विश्वास 
    और समझदारी।’’ 
    ये क्षणिकाएं जैसी हैं बिल्कुल अपने जैसी हैं। ध्ीरज इनका ध््रुव बिन्दु हैं और उनमें व्यक्तित्व का ठहराव एकनिष्ठ स्वयं में तल्लीन लगभग अनियारे जीवन की संवेदनात्मक अनुभूति हैं। आशा है पाठकवृन्द को मेरी अनुभूतियाँ अच्छी लगेंगी, इन पर अपनी संवेदनाओं की मुहर लगाना अब आपका दायित्व है। 

सद्भाव के संग,

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’