Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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भूल पता नहीं

मेरे गीत
           मेरे लिए रचनाकार होने की कोई बुनियादी शर्त नहीं है बस मेरी संवेदनशील कल्पना और सपनों को साकार करने के संकल्प ने मुझे साहित्य की विविध् विधओं से जोड़ा है। मेरे लिए लिखना बस लिखना नहीं बल्कि जिन्दगी के तमाम उतार-चढ़ावों को जीवन्तता से अपनी रचनाओं में उढ़ेलना है। मेरी काव्य रचनाओं या गीतों की बुनियाद भी अन्तस्थल की यही संवेदनशीलता है। अपने गीतों के इस संकलन को पाठकों को सौंपते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। मुझे यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि वर्षों पहले लिखी तथा प्रकाशित ये रचनाएं मेरे प्रशंसकों को अभी तक याद हैं। यदा-कदा कोई-न-कोई कवि मित्रा भी इन्हें पुनः प्रकाशित करवाने का आग्रह करता आ रहा था। अपनी व्यस्तताओं के कारण मैं इन रचनाओं का चयन कापफी विलम्ब से कर पाया लेकिन इनको चुनते हुए मुझे भी सुखद आश्चर्य हुआ कि ये गीत अब भी मुझमें सिहरन के साथ-साथ स्पन्दन पैदा करते हैं। ये गीत केवल प्रीत, प्रणय और भौतिक सौन्दर्य के नहीं हैं, वरन् इन्हें प्रेरणा, प्रणय और देश भक्ति के उपबन्धें में समाहित किया गया है। इनमें वतन की मिट्टी की सुगंध् के साथ-साथ जो मानवता का ज़ज़्बा पैदा करने की टीस भी, निश्चित ही समय की आवश्यकता बन पडे़ हैं ये गीत। 
          यहां यह बात मैं विशेष तौर पर रेखांकित करना चाहूँगा कि जब भी कोई रचनाकार अपनी सृजन यात्रा के प्रारंभिक चरण में होता है। उन दिनों उसके मन में उत्साह तथा जुनून का सागर हिलोरे ले रहा होता है, यही कारण है कि प्रत्येक रचनाकार की प्रारंभिक रचनाएं कलात्मक शिल्प-सौष्ठव की कसौटी पर पूरी तरह से खरी न उतरते हुए भी चिन्तन की प्रखरता तथा विद्रोही तेवर अपने में समाए रखती हैं। मुझे यह कहते हुए भी अत्यन्त गर्व का अनुभव होता है कि मैंने साहित्य को समाज और मानव-कल्याण के सजीव माध्यम के रूप में चुना है। साहित्य को मैं आम आदमी के दुःख-दर्द को अभिव्यक्त करने का सबसे बड़ा माध्यम मानता हूँ। 

‘मैने वेदना को अपनी 
गीतों में गुनगुनाया 
इसके सुरो को अपनी 
आवाज है बनाया 
रिमझिम ये सावन है 
मेरे पास मेरा मन है 
अनमोल ये रत्न है।’        

          मेरे इन गीतों में सामान्य जन की आशा-आकांक्षा, निराशा तथा उसके संघर्ष को वाणी प्रदान करने की कोशिश हुई है।
इन गीतों की पृष्ठभूमि में जहाँ समाज की विसंगतियाँ, उसकी जटिलताएँ तथा उसकी विषमताओं से उपजी कुंठा को रूपायित करने का प्रयास किया गया है तो दूसरी ओर मनुष्य की एकान्तिकता और उसे आनन्द देने वाले सुकोमल क्षणों को भी व्याख्यायित करने का सलोना-सा प्रयास है।
          कभी-कभार पाठकों को यह भी लगेगा कि मेरे गीतों में माध्ुर्य कम और कसैलापन अध्कि है, लेकिन यह भी मेरी विवशता है क्योंकि मेरे लिए आम जन की पीड़ा प्रथम लक्ष्य रहा है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े आदमी के दुःख-दर्द ने मुझे हमेशा ही उद्वेलित किया है।

‘‘जहर भी है जिंदगी तो 
पलक घूंटते जा उसे 
कंठ ही तो नील होगा 
परवाह उसकी है किसे?   
 

          मूलतः मेरी रचनाओं का प्रयोजन यह आम आदमी और उसकी भावना ही है। वैसे भी प्रत्येक रचना का अपने समय का महत्व होता है। यही कारण है कि रचना अपने समय का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है। 
          मैंने भी अपने रचना दायित्व और सामाजिक दायित्व को एक-दूसरे से बांध्ने की कोशिश की है, अपनी रचना के प्रति प्रतिब( होने के साथ-साथ मैं  अपने चारों ओर की जिन्दगी के प्रति भी सचेष्ट रहा हूँ, क्योंकि मैं बचपन से ही इन तमाम समस्याओं और संकटों से जूझता रहा हूँ और इस बात को मैंने महसूस किया है कि जीवन में आये संकटों से जितना मैं जूझता गया उतना ही मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया। यही  कारण है कि मेरे गीतों में प्रेरणा, प्रोत्साहन और संघर्ष के स्वर और अध्कि मुखर हो गये हैं। गीतों में अपने दर्द को उड़ेलना और अपनी छटपटाहट को रचनाओं के माध्यम से बाहर निकालने का इससे

बड़ा क्या माध्यम हो सकता है। 
‘परेशानी विकट बाधओं से 
नहीं हमको डरना है, 
इनका काम तो इन्सान को 
मजबूत करना है।’ 

जीवन की विषम राहों में तमाम कीमतों को चुकाने के बाद भी अपनी संवेदनाओं को जिंदा रखने का मेरा संघर्ष जारी है-  

‘‘अभी भी है जंग जारी
वेदना सोयी नहीं है,
मनुजता होगी ध्रा पर
संवेदना खोयी नहीं है।
किया है बलिदान जीवन
निर्बलता ढोयी नहीं है,
कह रहा हूँ ऐ वतन
तुझसे बड़ा कोई नहीं है।’’

            मैंने प्रयास किया है कि देश का प्रत्येक नागरिक इन पंक्तियों को पढ़कर अपने राष्ट्र के प्रति श्र(ान्वत हो क्योंकि जीवन तो सभी जीते हैं किन्तु उसका बोध् होना भी जरूरी है। राष्ट्र और राष्ट्र की प्रगति एवं मानवता के प्रति समर्पण भी हमारा कर्तव्य है। मैंने वजनदार उपमानों को अपनी रचना-प्रक्रिया में शामिल करने का कभी भी प्रयास नहीं किया, न ही यह मेरा हेतु रहा है। मैंने तो व्यक्तिगत जीवन में जो कुछ महसूस किया उसे अपनी रचनाओं का विषय बनाया। मैं समझता हूँ कि बिना व्यक्तिगत आत्मावलोकन के साहित्य-सृजन में जीवन्तता आ ही नहीं सकती-

‘‘मैं स्वयं ही किरण बनकर
निशा को भी प्रभा दूँगा,
मैं स्वयं ही हवन बनकर
स्वार्थ अपना जला दूँगा।’’

इसी यथार्थ का आस्वादन करते-करते मेरे गीतों ने संसार के समस्त दुःखों को आत्मसात् करने का सपना भी संजोया है-

‘‘सब कुछ देना पर मुझको
तुम इतना नेह न देना,
खो जाऊँ मैं तुझमें इतना
भूलूँ जग से दुख लेना।’’

          वस्तुतः रचनाकार  संसार से ही स्थापत्य कर उसी के समानान्तर संसार की सृष्टि करता है, यह एक नितान्त स्वतन्त्रा सृष्टि है। अनुभूति से शक्ति ग्रहण कर मनुष्य के मर्म को स्पर्श करने और संवेदना को संजोकर उसे जीवन्त बनाये रखने की छोटी सी कोशिश की है। सुकोमल भावनाओं का अंकन निश्चित रूप से रसास्वादन करता है-

‘‘दीपक से बाती का संबंध् जितना,
जीवन में अपना रहे प्यार इतना।
तुम्ही ने तो जीवन, हर पल संवारा,
तभी तो हृदय ने तुमको पुकारा।
चाँदनी का चंदा से संबंध् जितना,
जीवन में अपना रहे प्यार इतना।’’

जीवन में सारे अभावों, संत्रासों को अपना सच्चा साथी स्वीकार करते हुए इन्हें पथ के पाथेय के रूप में स्वीकार करने में मुझे

कभी कोई संकोच नहीं रहा है-
‘‘कदम-कदम पर कांटों से ही
आच्छादित था यह मन मेरा,
पीड़ाओं का आलिंगन था
कष्टों का घनघोर अंध्ेरा।
लघु जीवन के सघन विपिन में
कब तक अपने दिल से डरूँ मैं,
तुम्ही बताओ किससे कहँू मैं
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं।’’

          इसके अतिरिक्त इन गीतों का सबसे सबल उपबन्ध् इनमें स्पन्दित होती   राष्ट्र भक्ति की भावना है। मैं संपूर्ण जीवन का सार, मानव और देश के प्रति सर्वस्व समर्पण तथा अगाध् निष्ठा को मानता हूँ। जीवन का प्रत्येक क्षण अपने राष्ट्र और मानवता के प्रति समर्पित कर जन कल्याण के रास्ते पर चलना मेरे जीवन का ध्येय रहा है-

‘‘हर कदम इतिहास स्वर्णिम
हम इसे गलने न देंगे।
स्वयं जल जाएंगें लेकिन
देश हम जलने न देंगे।।’’

इसी प्रकार- 

‘‘भारत के रखवाले हैं हम, भारत के रखवाले,
सारा जग जाने हमको, हम देश-प्रेम के मतवाले।’’
‘‘हम प्रेम का दीप जलायेंगे, 
नवयुग ध्रती पर लायेंगे।’’

          मेरा मानना है कि साहित्य मनुष्य को खंडित करने वाली दृष्टियों से सदा विलग और सर्वाेच्च होता है। मैंने व्यष्टिगत् भावनाओं के अंकन के साथ-साथ समष्टिगत् चेतना को भी अपनी रचनाओं में स्थान देने की कोशिश की तथा अपने राष्ट्र को प्राण-पन से ऊँचे स्थान पर पूरे आदर के साथ प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है- 

‘‘रह-रहकर अब चलने का, नहीं समय है रे वीरों,
दिखला दो दुनिया को पौरूष, पीछे नहीं हटो ध्ीरों।
नहीं याद करता है उसको जग जो न कुछ कर दिखलाता 
संघर्षों की ताप में बढ़ता, लक्ष्य शिखर का वो पाता’’

          अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि संवेदनशीलता के साथ-साथ मैंने समाज की विसंगतियों और कुरीतियों को निकटता से देखा और महसूस किया है। सामाजिक जड़ता तथा अंध्विश्वास की बेड़ियाँ तोड़े बिना समाज में गुणात्मक परिवर्तन संभव नहीं होता। कहीं विद्रोही तेवर भी इन गीतों की प्रत्येक पंक्ति में दिखाई देंगे।

‘लीक-लीक तो कायर चलते 
तुम वीर बनो पथ को जानो 
तोड़ सभी कारा के बंध्न 
तुम बात सुनो मेरी मानो।’   

          इस पुस्तक के तीनों उपबंधें में इसकी संवेदना परिध् िप्रेरणास्पद गीत, प्रणयगीत और देशभक्ति, इन सरणियों में समाहित है। मेरे लिए इन गीतों के मध्य कोई विभाजक रेखा नहीं है वैसे भी काव्यात्मक अन्विति को खंडित करके विश्लेषित भी नहीं किया जा सकता।

          इस संग्रह में जहाँ मेरी प्रकाशित तमाम पुस्तकों के चुनिंदे गीत हैं वहीं कुछ गीत ऐसे भी हैं, जो किसी भी पुस्तक में अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं इन्हें भी इस संग्रह में समाहित किया गया है। जिन्हें प्रथम भाग में दिया गया है। 
मुझे विश्वास है कि मेरे चुनिंदा गीतों का यह संकलन जनमानस में नये उद्गार पैदा करने के साथ ही विशेष रूप से युवा पीढ़ी को नई दिशा देने की कोशिश करेगा। ये गीत साहित्य संसार में  एक बौ(िक उत्तेजना एवं सामाजिक बहस पैदा करने के साथ-साथ अकलुषित और भावुक तथा संवेदनशील मन को बचाने की दिशा में सार्थक सि( हो सकें तो मैं अपने को गौरवान्वित समझूँगा।  सुध्ी पाठकों, आलोचकों तथा विद्वतजनों के सुझावों तथा सम्मतियों की प्रतीक्षा में-
    

-रमेश पोखरियाल ‘निशंक’