Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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देश हम जलने न देंगे

‘निशंक’ की काव्य यात्रा

          राष्ट्र को कंकर-पत्थर का ढेर नहीं बल्कि अपनी आत्मा मानने वाले गढ़वाल हिमालय की गोद में साध्नारत युवा कवि रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ अल्पायु में ही अनेक काव्य खण्डों को लेकर साहित्य के क्षेत्रा में तेजी से उभरकर आये हैं।
          कवि ‘निशंक’ की काव्य साध्ना अबाध् गति से प्रवाहमान है, उसमें जन-जीवन के प्रति, समाज के प्रति, राष्ट्र के प्रति एक वेदना है, एक पीड़ा है, एक दर्द है। जब भी वे सुख-दुःख, हर्ष-विषाद के मनोभावों से आन्दोलित होते हैं तो उनमें एक आकुलता का स्पन्दन महसूस किया जा सकता है। उनकी यह आकुलता बहुजन हिताय से प्रेरित होती है। उनमें कुछ कर गुजरने की उत्कंठ चाह है।
          अब तो यह बात और भी उभर कर सम्मुख आ चुकी है जबकि, उनका काव्य, अनेक पड़ावों से गुजरता हुआ आम जीवन की भावनाओं को, एक नयी दिशा एक नयी चेतना प्रदान कर रहा है।
युवा कवि ‘निशंक’ की काव्य यात्रा - ‘समर्पण’ की समर्पित भावना ‘नवांकुर’ की नव चेतना, ‘मुझे विधता बनना है’ कि सामाजिक चुनौती, ‘तुम भी मेरे साथ चलो’ समष्टि सम्पृक्तता से होती हुयी अब ‘देश हम जलने न देंगे’ के आक्रोशजन्य विद्रोही एवं चुनौती भरी चेतावनी के माध्यम से, हमारी सुप्त चेतना को उद्बुद्ध कर रही है।