Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

Buy NowNext

सृजन के बीज

          यशस्वी शब्द साधक डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक’ के चिरन्तन चिन्तक व्यक्तित्व की अक्षय प्रतीक ‘सृजन के बीज’ की ये कविताएँ निश्चय ही ‘सृजन की चेतना’ से अनुप्राणित हैं। मुझे तो यह कविता संग्रह वस्तुतः कवि डॉ. ‘निशंक’ के इन्द्रध्नुषी जीवनानुभवों का प्यारा सा गुलदस्ता लगा है, जिसमें हर्ष-विषाद, आशा-निराशा और सत्य असत्य के शाश्वत झूले से झूलते हृदय की सजीव और सृजनात्मक झाँकियाँ आपको अनायास मोहित कर लेंगी।

      कवि डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भारतीयता के ऐसे सबल पक्षध्र रहे हैं, जिनके काव्य-चिन्तन की आधर भूमि रही है ‘आत्मविश्वास’ और इसी अजेय एवं दृढ़तम आत्म-विश्वास को डॉ. ‘निशंक’ ने ‘‘सृजन के बीज’’ की इस छोटी सी कविता के माध्यम से जीवन्त कर दिया है-

      ‘‘अपने को

      कम नहीं आंको,

      अपनी बातों को

      केवल

      आसमान पर मत टांको,

      तुम अपना मूल्य

      समझो

      और करो विश्वास

      कि तुम

      संसार के सबसे महत्वपूर्ण

      व्यक्ति हो!

      तुम ही

      सृष्टि की अद्भुत देन

      और तुम्ही

      समष्टि हो!’’

      वस्तुतः कविता मानव -हृदय की एक जीवन्त दशा है, जिसे आचार्यों ने ‘मानवीय चेतना के संकल्पनात्मक अनुभूति’ माना है।

      ‘सृजन के बीज’ कविता संग्रह की कविताएँ इस कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरती हैं। डाॅ. ‘निशंक’ को मैने सदैव उदात्त चिन्तन और मानवीय संवेदनाओं के प्रति पूर्णतः समर्पित रचनाकार तथा समाज के उच्चतर जीवन-मूल्यों के पक्षध्र के रूप में देखा है। इस कविता संग्रह में भी उनका यही उदात्त चिन्तन यत्रा-तत्रा मुखर हुआ है।

      मैंने डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की बहुविध् साहित्य-सर्जना को निरन्तर गहराई से देखा और परखा है, अतः मैं अध्किार पूर्वक कह सकता हूँ कि डॉ. ‘निशंक’ की कविताएँ उनके कर्मशील और पारदर्शी जीवन का निर्मल दर्पण हैं। यही अटूट और बेजोड़ कर्मशीलता उनकी शक्ति बनी है। यहाँ मैं इस कविता संग्रह की कविता ‘भीगा हुआ आदमी’ आपके समक्ष उद्ध्ृत करके डॉ. ‘निशंक’ के व्यक्तित्व की उस निडरता से आपको रू-ब-रू करना चाहता हूँ, जिसने राजनीति की पिफसलन भरी राहों पर चलने वाले शब्द-ब्र“म के इस समर्पित आराध्क को जीवनी शक्ति दी है-

      ‘‘भीगा हुआ आदमी कभी,

      बारिश से नहीं डरता,

      कपफन सिर पे बाँध्ने वाला,

      कभी मौत से नहीं डरता।

      सच की राह में तो

      ढेरों बाधएँ आती हैं,

      किन्तु अटल निश्चय देख,

 

      वे बुलबुलों सी मिट जाती हैं।’’

      ‘सृजन के बीज’ कविता संग्रह में डॉ. ‘निशंक’ की काव्य- साध्ना के अनेक रंग सहृदय पाठकों के हृदयों को पुलकित करेंगे और कभी उन्हें प्रेरणा का अमृत मिलेगा, तो कभी अपने राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना से मन आल्हादित हो उठेगा।

      मैंने जब-जब डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कविताओं को गहरे उतर कर देखा-परखा है, तब-तब मुझे लगा है कि डॉ. ‘निशंक’ की प्रबल आस्था ‘मनुष्य और उसकी मनुष्यता’ में केन्द्रित रही है, चूंकि डाॅ. ‘निशंक’ के अनुसार ‘मनुष्य की विजय’ और उसकी विमुक्ति जीवन-संग्राम की सर्वोत्तम उपलब्ध् है, जिसने मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बना दिया है। डॉ. ‘निशंक’ के इसी उदात्त चिन्तन की परिचायक एक छोटी सी कविता ‘‘पीड़ा का मरहम’’ मैं इस कविता संग्रह से यहाँ उद्ध्ृत करना चाहता हूँ, जिसमें कवि डॉ. ‘निशंक’ का चिरन्तन चिन्तन मुखर हो उठा है-

      ‘‘मुझे दुःख और पीड़ा की,

      चीत्कार सुनाई देती है।

      अध्ीर करती है यह मुझे,

      मेरा चैन छीन लेती है।

            बेचैनी में भी मैं,

            चुपचाप खड़ा नहीं हूँ।

            किसी अंध्ेरे कोने में

            आँसू लिए पड़ा नहीं हूँ।

      इस पीड़ा के मरहम के लिए

      मैं जीवन में निकल पड़ा हूँ।

      दुःखों से लड़ने के लिए

      चट्टान की तरह खड़ा हूँ।’’

      डॉ. ‘निशंक’ के इस कविता संग्रह ‘‘सृजन के बीज’’ को पूर्णतः सार्थक सि( करने वाली इस छोटी सी कविता में प्रेरणा का जो अपार अमृत भरा हुआ है, वही आज हमें चाहिए।

      निःसन्देह, आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में इस विज्ञान के हिंडोले में बैठकर भौतिकता के खोखले आकाश में भले ही उड़ रहे हैं, लेकिन आधर तो ध्रती के पास ही है। डॉ. ‘निशंक’ के इस काव्य संग्रह की एक कविता है ‘‘मेरी जिद्द है’’, जिसमें कवि स्वयं को किसी भी तरह ‘असाधरण’ बनाने का लक्ष्य लेकर चलने का अजेय, अदम्य संकल्प प्रकट करता है-

      ‘‘मिल सके जो आसानी से,

      चाहत उसकी कहाँ है?

      इसको तो पाने के लिए,

      खड़ा ये सारा जहाँ है।

            मेरी जिद्द तो

            उसको पाने की है जिन्दगी में

            जो मुकद्दर में लिखा ही नहीं है।

            मेरा मकसद तो

            उसे ढूँढ निकालने का है

            जो अनन्त में छिपा है,

            लेकिन दिखा ही नहीं है।।’’

      ऐसी ही, मनोहारी, प्रेरक और उदात्त चिन्तन से परिपूर्ण डॉ. ‘निशंक’ का कविता संग्रह ‘‘सृजन के बीज’’ मैं सहृदय पाठकों के हाथों में सौंप रहा हूँ।