Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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विपदा जीवित है

          सुख हो या दुःख, जीवन में इनका आना-जाना लगा रहता है। दोनों का मनुष्य जीवन में अपने प्रकार का स्थान है। एक ओर सुख हमें अलौकिक आनन्दानुभूति प्रदान करता है, तो दूसरी ओर दुःख हमें आत्मानुभूति करवाता है, और दोनों ही जीने के लिये प्रेरणा देते हैं। 
          बार-बार आने-जाने वाला संकट विपदा कहलाता है। खुशियों के क्षण बहुत छोटे होते हैं। इसलिए उनके गुजरने का पता भी नहीं चलता। विपदा बहुत बड़ी प्रतीत होती है और गुजर जाने के बाद भी स्मृति पटल पर हमेशा जीवित रहती है। इसीलिये विपदा के गुजर जाने के बाद जो अनुभूति होती है, उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। 
          जीवन की विपदाओं, विडम्बनाओं और समस्याओं को भोगने के पश्चात् मनुष्य को एक आत्मबल मिलता है। यही आत्मबल उसमें जीने की जिजीविषा पैदा करता है। जो लोग विपदा के क्षणों में ध्ैर्यपूर्वक खड़े रहकर उसका सामना करते हैं, वे एक दिन अपनी मंजिल को प्राप्त करने में सपफल रहते हैं। 
          प्रस्तुत संग्रह में आम आदमी की इन्हीं कठिनाइयों को कहानियों के माध्यम से उकेरा गया है। प्रत्येक पाठक को इन कहानियों में कहीं न कहीं अपना दुःख-दर्द जरूर छिपा हुआ महसूस होगा। यह कहानियाँ आज के परिप्रेक्ष में संघर्षरत और दौड़-भाग में व्यस्त आदमी के दिल को कुछ सुकून दे पायेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है। 
          मेरी ये कहानियाँ लोगों को समाज के दबे कुचले और अन्तिम छोर पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा का थोड़ा सा भी अहसास करा पायें, तो मैं समझूंगा कि मेरा यह छोटा सा प्रयास कुछ तो सपफल रहा। 
          इस कहानी संग्रह को प्रकाशित करने में अपने तमाम उन मित्रों और सहयोगियों के प्रति मैं आभार प्रकट करना चाहता हूँ, जिनके परामर्श और सक्रिय सहयोग से यह संग्रह आपके हाथों तक पहुँच पाया है।

'रमेश पोखरियाल ‘निशंक’'