Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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टूटते दायरे

           श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ से मेरा पहला परिचय करीब बीस-बाईस साल पहले एक साहित्यकार के रूप में हुआ था। वे एक पत्रिका और अपना प्रकाशन चलाते थे। मुझे याद है कि मैंने तब इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि वे साहित्य के अलावा जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी उतने ही सक्रिय हैं.... दूसरे शब्दों में, वे राजनीतिज्ञ और लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। लेखन और प्रकाशन के प्रति उनकी जो निष्ठा थी, उससे मैं परिचित था, मगर मैं उन्हें साहित्य की दुनिया में कदम रख चुके एक पूर्णकालिक लेखक की तरह ही देख रहा था। जिस राजनीतिक संगठन के वे सदस्य थे, मैं उससे भी नहीं जुड़ा था, मगर साहित्य के प्रति उनकी अंतरंगता से मैं प्रभावित था। मुझे लगा कि अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन के बीच जो आदमी साहित्य के आत्मीय क्षण उतनी ही अंतरंगता के साथ जी लेता है, वह कोई छोटी बात नहीं है। 
           उन्होंने अपनी कुछ कहानियाँ मुझे पढ़ने के लिए दीं और उन पर अपनी प्रतिक्रिया माँगी। उन कहानियों में एक अभावग्रस्त मध्यवर्गीय युवक की अपने समाज को लेकर व्यक्त की गई गम्भीर चिंताएं थीं।
          कहानियों में कोई निश्चित परिवेश नहीं था, जैसा कि अपने ही पहाड़ी क्षेत्रा का निवासी होने के कारण मैं उनकी कहानियों में तलाश रहा था, लेकिन परिवेश से जुड़े जो संदर्भ और बिंब उनकी कहानियों में थे, उनमें से अध्कितर हमारे ही चारों ओर के थे। उन कहानियों में सापफ देखा जा सकता था कि उनकी मुख्य चिंता भौतिक आपाधपी के बीच तेजी से भागते हुए आज की कहानी में क्षरित होते जा रहे मानवीय मूल्यों के तलाश की थी। 
          वह पिछली सदी का आखिरी दशक था, जब एक सदी आखिरी साँसें ले रही थी और दूसरी दस्तक दे रही थी। पूरे संसार में इस अंतर को केवल बु(िजीवी और कलाकार ही नहीं, समाज के हर तबके के लोग तलाश रहे थे। अवश्य ही निशंका की उन आरम्भिक कहानियों में एक नए लेखक की तरह का कच्चापन मौजूद था, मगर मानवीय जिज्ञासा का ऐसा स्वरूप वहाँ मौजूद था, जो एक दृष्टिसम्पन्न लेखक के लिए आवश्यक होता है। 
          इन बातों ने मुझे आकर्षित किया और मैंने अपनी प्रतिक्रिया संक्षेप में उन्हें भेजी....यह भी लिखा कि विस्तार से कहानियों की समीक्षा करते हुए उन्हें पत्रा लिखूंगा। मगर उन्हीं दिनों मुझे तीन वर्ष के लिए विदेश जाना पड़ा और वहाँ की नई व्यस्तताओं के बीच लिखना संभव नहीं हो पाया। उन्हीं दिनों मैंने महादेवी जी के रामगढ़ आवास को एक साहित्यिक संग्रहालय के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया था, जो अध्ूरा छूट गया था। 
          मेरे विदेश प्रवास के दौरान ही ‘निशंक’ हमारे तत्कालीन राज्य उत्तर प्रदेश के संस्कृति मंत्राी बने और मेरी अनुपस्थिति में उन्होंने बिना मेरे कहे संग्रहालय परिसर का कई बार भ्रमण किया और एक पुस्तकालय भवन का निर्माण करवाया, जो आज भी ‘शैलेश मटियानी पुस्तकालय’ के रूप में वहाँ मौजूद है। इस बात से सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि जीवन की उनकी वरीयताएँ क्या हैं।