Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’

Dr. Ramesh Pokhriyal 'Nishank'

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भारतीय संस्कृति, सभ्यता एवं परम्परा

          भारतीय संस्कृति एक विशाल वटवृक्ष के समान है। यह जीवन जीने की एक आदर्श कला और आदर्श दृष्टिकोण का निर्माण करती है। इस विशाल समुद्र रूपी संसार में अनेकों जातियों, ध्र्मों और सम्प्रदाय के लोग निवास करते हैं। हर देश की और हर समाज की अपनी एक संस्कृति होती है, जिसके आधर पर ही वह देश, वह समाज या उसमे निहित मनुष्य अपना आचार-व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करते हैं। संस्कृति का उद्गम सभ्यता से होता है। संस्कृति देशकाल, समय और परिस्थितियों के साथ-साथ निरन्तर आगे के लिये गतिमान रहती है।

           प्राचीनकाल में हमारे पुरूखों ने सभ्यता को सुसंस्कृत करने के लिए अनेक नियम और सि(ान्त तय किये। मनुष्य का आचरण कैसा हो, जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या हो, मनुष्य का विकास कैसे हो इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुये कुछ जीवन मूल्य तय किये गये, उनका अनुपालन करने एवं करवाने के लिये कुछ मान्यतायें भी तय की गई। स्वर्ग और नरक का डर भी दिखाया गया। कालान्तर में इसी सब ने संस्कृति का रूप धरण किया।

          किसी भी समाज द्वारा मूल्यों की प्रतिष्ठापना की जाती है, जीवन को सरल और सुगम तरीके से संचालित करने के लिये स्थापित किये गये इन मूल्यों को वह समाज पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाता है, इन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिये व्यक्ति और समाज कभी-कभी अपनी जान की बाजी तक लगा देता है। बलिदान और त्याग की यह भावना संस्कृति कहलाती है।

           भारतीय संस्कृति विश्व की सभी संस्कृतियों में सबसे अनूठी, अनोखी और श्रेष्ठ है। यह संस्कृति भौतिकता से अलग सत्य, अहिंसा, सदाचार और शान्ति की पक्षध्र रही है, इसका मूलतत्व आत्मा और परमात्मा की सत्ता की स्वीकार्यता के साथ आध्यात्मिक उन्नति करना है।

          इस संस्कृति में वे सभी तत्व हैं जो सर्वसमाज और समस्त विश्व के कल्याण के लिये आवश्यक है। प्राचीन ट्टषि मुनियों ने इस संस्कृति को अक्षुण बनाये रखने हेतु ध्र्म-कर्म का आवरण लेकर भी कुछ मान्यतायें स्थापित की हैं।  ये मान्यतायें किसी न किसी वैज्ञानिक आधर पर प्रतिस्थापित हंै। आज कम्प्यूटर के इस युग मंे वे सभी अवधरणायें और मान्यतायें वैज्ञानिकता के दृष्टिकोण पर एकदम खरी उतरती हैं।

           संस्कृति जैसे विशाल विषय को एक छोटी सी पुस्तक में समाहित करना कठिन ही नहीं अपितु असम्भव कार्य भी है। पिफर भी संस्कृति के कुछ पहलुओं को स्पर्श करते हुए मैंने यह पुस्तक लिखने का छोटा सा प्रयास है।

          आज जिस प्रकार तेजी से सांस्कृतिक मूल्यों का ह्मस होता जा रहा है, नई पीढ़ी जिस तरह से तेजी के साथ पाश्चात्य संस्कृति का अंधनुकरण कर रही है, उससे मानवीय मूल्यों में भी उसी तेजी से गिरावट आई है। इससे यह निश्चित है कि भारतीय समाज और भारत के लोगों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

          सैकड़ों वर्षों से अक्षुण चली आ रही इस संस्कृति पर खतरे के जो बादल छा रहे हैं, वह सिपर्फ एक व्यक्ति, एक समाज या भारत राष्ट्र के लिये नहीं अपितु समस्त विश्व के लिये चिन्तनीय है, क्योंकि भारतीय संस्कृति ही विश्व की सब संस्कृतियों का प्रतिनिध्त्वि करती है। इसकी रक्षा करना और इसका उन्नयन करना प्रत्येक भारतवासी का स्वाभाविक कर्तव्य होना चाहिये।

          इस पुस्तक में ऐसे बहुत से विषय हैं जिन्हें मैं सम्मिलित नहीं कर पाया और पिफर भी कोशिश रही है कि थोड़ा-थोड़ा ही सही हर विषय को छू लिया जाय, बावजूद इसके मेरा यह प्रयास पाठकों को इस श्रेष्ठ, अक्षुण संस्कृति के सामाजिक, आर्थिक, धर्मिक और वैज्ञानिक पक्ष से अवगत कराने का एक छोटी सी कोशिश है।

 

डाॅ0 रमेश पोखरियाल ‘निशंक’